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भारतीय महिलाओं का दमदार पंच

मोनिका शर्मा | UPDATED Nov 29 2018 12:07PM IST
भारतीय महिलाओं का दमदार पंच

चैम्पियन खिलाड़ी एमसी मैरीकॉम ने महिला विश्व मुक्केबाजी चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक हासिल करने के बाद आंसुओं के साथ कहा कि मैं भारत को स्वर्ण पदक के अलावा और कुछ नहीं दे सकती। लेकिन सच तो यह कि देश को गौरवान्वित करने साथ ही मैरी ने भारत की महिलाओं को प्रतिबद्धता और हौसले की सौगात दी है।

वे एक मां और पत्नी की भूमिका का निर्वहन करते हुए एक ऐसे क्षेत्र में उपलब्धि हासिल कर विश्व चैम्पियन बनीं हैं जिसमें महिलाओं का दखल न के बराबर था। हालांकि शुरुआत से ही मैरी का सफर आसान नहीं रहा पर संघर्ष और प्रतिबद्धता के बल पर उन्होंने मुक्केबाजी की दुनिया में अपना ही नहीं देश का भी नाम रोशन किया है।

गौरतलब है कि हाल ही में भारत की दिग्गज खिलाड़ी एमसी मैरीकॉम ने महिला विश्व मुक्केबाजी चैम्पियनशिप के 10वें संस्करण में 48 किलोग्राम भारवर्ग का खिताब अपने नाम कर लिया है। यूक्रेन की युवा खिलाड़ी हाना ओखोटा को 5-0 से मात देकर मैरीकॉम स्वर्ण पदक हासिल कर छह बार वर्ल्ड चैंपियनशिप जीतने वाली दुनिया की पहली खिलाड़ी बन गई हैं।

इससे पहले मैरी ने साल 2002, 2005, 2006, 2008 और साल 2010 में विश्व चैंपियनशिप का खिताब अपने नाम किया था। इसके अलावा मैरी 2001 में रजत पदक भी जीत चुकी हैं। मैरी कॉम अब विश्व चैम्पियनशिप (महिला एवं पुरुष) में सबसे अधिक पदक जीतने वाली खिलाड़ी भी बन गई हैं। हाल ही में भारत की मेजबानी में 70 देशों की 300 महिलाएं दिल्ली में आयोजित अन्तराष्ट्रीय मुक्केबाजी के महाकुम्भ में शामिल हुईं

तो भारतीय महिला मुक्केबाजों से काफी उम्मीदें लगी हुईं थी। गौरतलब है कि 12 साल पहले जब हमारा देश इसका मेजबान था तब कोई विशेष कामयाबी हमारे हिस्से नहीं आई थी। महिला मुक्केबाजी जैसी स्पर्धा में भारत की स्थिति बेहद कमज़ोर थी। यह होना लाजिमी भी था क्योंकि इस क्षेत्र में महिलाओं का आगे आना अनगिनत मुश्किलों को पार करने जैसा था।

हमारे सामाजिक-पारिवारिक ढांचे में शारीरिक सौष्ठव वाली इस खेल में बेटियों का दखल सहज स्वीकार्य नहीं था, लेकिन हालिया बरसों में भारत में विश्वस्तरीय महिला मुक्केबाज़ खिलाड़ी अपनी पहचान बना रही हैं। यही वजह है कि अब इस खेल में बेटियों की भागीदारी को लेकर भी लोगों की राय बदल रही है।

तीन बच्चों की मां और भारत की स्टार महिला मुक्केबाज एमसी मैरीकॉम खुद मणिपुर में बॉक्सिंग अकादमी चलाती हैं। हाल ही में खेतों में काम करते हुए अपना बचपन बिताने वाली देश की इस बेटी ने अपने से 13 साल छोटी प्रतिद्वंदी को हराकर छठी बार विश्व महिला बॉक्सिंग में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा है।

निःसंदेह उनकी कामयाबी के सफ़र ने महिला बॉक्सिंग के प्रति देश भर में लोगों का नजरिया भी बदला है। यहां तक कि युद्ध की विभाषिका के हालातों से जूझते हुए अपने परिवार से छुपकर मुक्केबाजी करने वाली सोमालिया की रमाला अली भी मैरी कॉम को अपनी प्रेरणा मानती हैं। भारत में जहां एक आम खिलाड़ी के लिए संघर्षपूर्ण स्थितियां हैं

वहां मुक्केबाजी जैसे क्षेत्र में तो बेटियों के लिए पहचान बनाना और भी कठिन है। लेकिन कुछ सालों से हमारे यहां कई महिला मुक्केबाज़ पूरी शिद्दत से इस क्षेत्र में आगे आ रही हैं। सुखद है इनके साथ पारिवारिक सहयोग भी है। खुद मैरीकॉम भी अपनी कामयाबी के लिए अपने पति ओनलर के सहयोग और साथ की बात करती रही हैं।

निःसंदेह अपनों का सहयोग और भरोसा किसी भी क्षेत्र में महिलाओं के लिए आगे बढ़ने की राह सहज बनाता है। साथ ही समाज का बदलता नजरिया भी बॉक्सिंग की दुनिया में बेटियों के दखल की बड़ी वजह है। आज पिंकी जांगड़ा, सरिता, लवलीना, सोनिया चहल, स्वीटी बूरा और सिमरनजीत कौर जैसी विश्वस्तरीय महिला मुक्केबाज़ भारत की पहचान बना रही हैं।

भारत में ही आयोजित 10वीं विश्व महिला बॉक्सिंग चैंपियनशिप में भी भारत की चार बॉक्सर सेमीफाइनल में पहुंची हैं। इनमें सिमरनजीत कौर और लवलीना ने कांस्य पदक अपने नाम किए हैं। जबकि सोनिया ने रजत पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया है। महिला मुक्केबाजी के इस महाकुम्भ में मैरीकॉम के हर भारतीय को गर्वित करने वाले विश्व रिकॉर्ड के साथ एक गोल्ड, एक सिल्वर और दो ब्रॉन्ज मेडल देश की झोली में आए हैं।

जिस देश में खेल के मैदान में तिरंगा लहराने का सपना देखने वाली बेटियों के लिए उलझनें आर्थिक ही नहीं, सामाजिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने वाली भी होती हैं वहां अभावों और विषमताओं की आग में तपकर आगे आने वाली मैरीकॉम जैसी मांओं और बेटियों का सफर यकीनन प्रेरणादायी है। जीतने के जज्बे के मायने समझाने वाली ऐसी कहानियां बताती हैं कि बेटियां किसी भी मोर्चे पर कम नहीं हैं।

इतनी परेशानियां उठाकर वे आगे बढ़ सकती हैं तो जरा सोचिये कि सहजता, सुरक्षा और समानता का माहौल पाकर वे सफलता के किस शिखर को छू सकती हैं। मुक्केबाजी जैसे क्षेत्र में भारत की महिलाओं का बढ़ता दबदबा कई मायनों में एक तयशुदा सोच से बाहर आने की बानगी है।

इन महिला खिलाड़ियों के संघर्ष को देखकर आशा और विश्वास को एक नया आधार मिलता है। विशेषकर मैरी कॉम की सफलता तो आत्मविश्वास, जीतने का जज्बा, मां का समर्पण और एक स्त्री के मन की दृढ़ता का उदाहरण है, जो कई बेटियों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।


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-Tags:#Mary Kom#Sweety Boora#Sonia Lather

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