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अरुणाचल पर चीन को जवाब देने की जरूरत

एशिया में बादशाहत कायम करने की चीन की चाहत बहुत पुरानी है।

अरुणाचल पर चीन को जवाब देने की जरूरत
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अरुणाचल प्रदेश के बहाने भारत पर दबाव बनाने की चीन की कूटनीति निंदनीय है। एशिया में बादशाहत कायम करने की चीन की चाहत बहुत पुरानी है। अपनी इसी चाहत के चलते चीन के अपने पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते मधुर नहीं हैं। विकसित देश जापान और तेजी से शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभर रहे भारत के रहते एशिया में चीन की चौधराहट संभव नहीं है। वियतनाम और दक्षिण कोरिया भी चीन की विस्तारवादी नीति से तंग हैं।

बड़ी अजीब बात है कि आर्थिक वैश्वीकरण के युग में चीन भौगोलिक विस्तार के पेंचोखम में खुद को खपा रहा है। यह जानते हुए कि चीन के मैन्यूफैक्चरिंग उद्योग के लिए भारत बड़ा बाजार है, फिर भी बीजिंग नई दिल्ली को उकसाने के लिए जिस तरह की कूटनीतिक चालें चल रहा है, उससे लगता है कि वह अपनी आर्थिक हितों की परवाह नहीं कर रहा है।

चीन को समझना चाहिए कि अरुणाचल प्रदेश के छह शहरों के तिब्बती और मैंडरिन में कागजी नाम बदल देने से या गूगल को धमका कर अरुणाचल को चीनी नक्शे में दिखाने के पैंतरे से कुछ नहीं होने वाला है। भारत इससे दबने वाला नहीं है। अरुणाचल प्रदेश भारत का है और रहेगा। चीन अगर इस मुगालते में है कि उसने 1962 में भारत से अक्साई चीन झटक लिया था तो अब भी वह अरुणाचल के तवांग चोटी को हड़प लेगा, तो अब वक्त बदल चुका है।

अब सामरिक रूप से भारत काफी मजबूत हो चुका है। अमेरिका के साथ भारत की सामरिक साझेदारी इस समय बेहद मजबूत है। रूस, जापान, फ्रांस, ब्रिटेन और इजराइल के साथ भी भारत के रक्षा संबंध काफी प्रगाढ़ हैं। इतना ही नहीं भारत की अपनी रक्षा तैयारी भी बहुत मजबूत है। आधुनिक हथियार और उच्च तकनीक मिसाइलों से लेस है। संयोग से केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार भी है जो इच्छाशक्ति से मजबूत है।

इस समय चीन की परेशानी को समझा जा सकता है। आर्थिक मोर्चे पर वह लगातार पिछड़ रहा है। मेड इन चाइना का आकर्षण खत्म हो रहा है। उसकी जीडीपी चाहकर भी नहीं बढ़ पा रही है, जबकि भारत सात फीसदी से अधिक दर से ग्रोथ कर रहा है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा पर भी चीन को मनमुतािबक सफलता नहीं मिल रही है। रेशम मार्ग योजना के उद्घाटन से भी पश्चिमी देशों ने अपने को चीन से अलग कर लिया है।

दक्षिण चीन सागर में कब्जे की इच्छा भी सिरे से परवान नहीं चढ़ रही है। इस मसले पर फिलिपींस से हेग अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल में चीन को हार का सामना करना पड़ा था। दक्षिण चीन सागर में चीन के दबदबे को अमेरिका, भारत, फिलिपींस, जापान, वियतनाम से चुनौती मिल रही है। तिब्बती बौद्ध धर्म गुरु दलाई लामा के भारत में रहने और चीनी विरोध के बावजूद तवांग बौद्ध मठ की उनकी यात्रा करते रहने से भी चीन परेशान रहता है।

चीन चाहकर पर तिब्बत वासियों की दलाई लामा के प्रति अगाध आस्था को कम नहीं कर पा रहा है। भूगौलिक और सामरिक रूप से बेशक चीन का तिब्बत पर कब्जा है, लेकिन धार्मिक व आध्यात्मिक रूप से वह अभी तिब्बत को दलाई लामा के प्रभाव से मुक्त नहीं करा पाया है। भारत के साथ चीन का सीमा विवाद भी है, लेकिन इन परेशानियों की खीझ वह भारत पर दबाव बना कर निकालने की कोशिश कर रहा है।

पाक के जरिये भी चीन भारत को घेरता रहा है, जबकि भारत हमेशा शांत प्रिय देश रहा है, लेकिन कई बार चुप्पी को कायरता समझ ली जाती है। चीन की ऊटपटांग हरकतों पर भारत की चुप्पी को कोई भारत की कमजोरी नहीं समझे, इसके लिए जरूरी है कि नई दिल्ली अरुणाचल पर अपनी चुप्पी तोड़े। चीन को कूटनीतिक और राजनीतिक जवाब देने की तत्काल जरूरत है।

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