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डॉ. रमेश ठाकुर का लेख : नए दौर में भारत-डेनमार्क रिश्ते

भारत और डेनमार्क के सामरिक रिश्ते वर्षों से मधुर रहे हैं जिनमें सांस्कृतिक और व्यापारिक दोनों शामिल हैं।नमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन का तीन दिवसीय भारत दौरा कई मसलों के लिए अहम रहा है। दौर से दोनों मुल्कों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत मिली, साथ ही व्यापारिक दृष्िटकोण से कई ऐसे क्षेत्रों में सहमति भी बन सकी जो भारत-डेनमार्क के मध्य आयात-निर्यात को और आगे बढ़ाने को काम करेंगे। मौजूदा समय में करीब दो सौ से ज्यादा डेनमार्क कंपनियां भारत में कार्यरत हैं। वहीं, भारत की भी 60-70 कंपनियां वहां अपना कार्य कर रही हैं। व्यापार के लिए दोनों जगहों का माहौल बहुत अच्छा है।

डॉ. रमेश ठाकुर का लेख : नए दौर में भारत-डेनमार्क रिश्ते
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डाॅ रमेश ठाकुर

डॉ. रमेश ठाकुर

डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन का तीन दिवसीय भारत दौरा कई मसलों के लिए अहम रहा है। दौर से दोनों मुल्कों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत मिली, साथ ही व्यापारिक दृष्टिकोण से कई ऐसे क्षेत्रों में सहमति भी बन सकी जो भारत-डेनमार्क के मध्य आयात-निर्यात को और आगे बढ़ाने को काम करेंगे। कोरोना काल में धीमी पड़ी दोनों देशों के बीच वार्ता को भी नया आयाम मिला है। डेनमार्क प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा, कारोबार, निवेश सहित द्विपक्षीय संबंधों के सम्पूर्ण आयामों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ विस्तृत चर्चा की। उन्होंने इंडो-पैसिफिक और अफगानिस्तान में वर्तमान स्थिति पर भी चर्चा की। उन्होंने अफगानिस्तान के लोगों के समर्थन में अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की। भारत में तीन दिन का दौरा जिस ऊर्जा के साथ मेटे ने किया उनके समकक्ष प्रधानमंत्री मोदी ने भी उनकी तारीफ की। वार्ता के उपरांत जब मीडिया को दोनों नेताओं ने संयुक्त रूप से संबोधित किया तो डेनमार्क के प्रधानमंत्री मेटे ने भी मोदी की तारीफों का पुल बांधते हुए उन्हें दुनिया के लिए प्रेरणादायक बताया और देश-दुनिया के लिए विजनरी नेता बताया।

दुनिया इस बात को जानती है कि डेनमार्क काफी समय से अनगिनत निस्वार्थ भाव से जनमानस को स्वच्छ पानी और नवीकरणीय ऊर्जा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उनके द्वारा हासिल महत्वाकांक्षी लक्ष्य को भारत सरकार ने भी सराहा और दुनिया के अन्य देश भी प्रशंसा कर रहे हैं। गौरतलब है भारत और डेनमार्क के सामरिक रिश्ते वर्षों से मधुर रहे हैं जिनमें सांस्कृतिक और व्यापारिक दोनों शामिल हैं। दोनों मुल्क सदियों से एक-दूसरे के व्यापारिक साझेदार रहे हैं। कभी ऐसा मौका नहीं आया जब किसी तरह कोई कोई दिक्कतें हुई हों। मौजूदा समय में करीब दो सौ से ज्यादा डेनमार्क कंपनियां समूचे हिंदुस्तान में कार्यरत हैं। वहीं, भारत की भी 60-70 कंपनियां वहां अपना कार्य कर रही हैं। व्यापार के लिए दोनों जगहों का माहौल बहुत अच्छा है। कोविड में भी सभी कंपनियां बिना रुके सक्रिय रहीं, सरकारों ने प्रत्येक जरूरत की भरपाई समय-समय पर की।

भारत-डेनमार्क कंपनियां स्वच्छ प्रौद्योगिकी, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि एवं पशुपालन, जल एवं कचरा प्रबंधन, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, डिजिटलीकरण, स्मार्ट सिटी, पोत क्षेत्र की सभी कंपनियां और प्रतिष्ठान अच्छे वातावरण में काम कर रही हैं, क्योंकि दोनों तरफ मजबूत सहयोग मिल रहा है। फिलहाल मेटे फ्रेडरिक्सन की भारत यात्रा एक और नई दिशा में अच्छी पहल साबित हुई है। वह है हरित सामरिक गठजोड़, जिसमें दोनों देश सहमत हुए हैं। हरित क्षेत्र में नई दिशा देना समय की आवश्यकता है। इसमें स्वच्छ वातावरण, जलवायु क्षेत्र, आपदाओं से निपटने की मुकम्मल कोशिशें आदि शामिल हैं। कोरोना के बाद समूचा संसार इस दिशा में आगे बढ़ रहा है। इस वक्त जो भी बड़ा नेता किसी अन्य देश का दौरा कर रहा है, अपने दौरे में हरित मुद्दे को जरूर जोड़ रहा है, जोड़ना भी चाहिए, क्योंकि इससे मानवीय जीवन का संरक्षण जो निहित है। नित बदलते पर्यावरण को देखते हुए भारत-डेनमार्क के संयुक्त रूप से हरित सामरिक क्षेत्र में किए गए साझा प्रयास सराहनीय हैं। इस गठजोड़ को आगे बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन का द्विपक्षीय संवाद के लिए स्वागत भी किया।

गौरतलब है, हरित क्षेत्र को नई गति देने के लिए इस वक्त सभी देश आपस में मिलकर काम कर रहे हैं। इस तरह की कोशिशें अब एशियाई मुल्कों में भी होनी शुरू हुई हैं, जो अति आवश्यक भी हैं। डेनमार्क-भारत के मध्य हरित सामरिक संग्राम का काम वैसे तो एकाध वर्षों से शुरू हो चुका है, लेकिन बीते इन्हीं दिनों में कोरोना संकट के चलते काम थोड़ा हल्का पड़ा था, जिसे फिर से आरंभ करने पर सहमति बनी है। इस मुद्दे को लेकर मेटे फ्रेडरिक्सन की यात्रा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके साथ बैठक करके हरित सामरिक के प्रगति पर बातचीत की और समीक्षाएं भी हुईं। पिछले ही साल 28 सितंबर 2020 को वर्चुअल मीटिंग के जरिये शिखर बैठक में भारत-डेनमार्क ने हरित सामरिक गठजोड़ को हरी झंडी दिखाई थी। हालांकि उसकी व्यक्तिगत समीक्षा के लिए हाल में हमारे विदेश मंत्री एस जयशंकर ने डेनमार्क का दौरा भी किया था जिसकी प्रगति रिपोर्ट उन्होंने प्रधानमंत्री से आकर साझा भी की थी।

बहरहाल, मेटे फ्रेडरिक्सन ने अपनी भारत यात्रा के दौरान दोनों मुल्कों के दरम्यान व्यापारिक पक्षों और आपसी हितों से जुड़े क्षेत्रीय और बहुस्तरीय मुद्दों पर खुलकर चर्चा की। पूर्व में भी डेनमार्क के साथ भारत के कारोबारी एवं निवेशी संबंध बहुत ही मजबूत रहे हैं, उनको और गति मिले, इस बात को ध्यान में रखकर दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने अगले दस वर्ष का व्यापारिक ब्लू प्रिंट तैयार किया। अगले दस वर्षों में दोनों देश एक-दूसरे के यहां करोड़ों का निवेश करेंगे, उन सभी समझौतों पर सौहार्द्रपूर्ण सहमति बनाई गई। अभी फिलहाल दोनों तरफ जितनी कंपनियां सक्रिय हैं उनमें और इजाफा किया जाना सुनिश्चित हुआ है जिनमें सबसे ज्यादा जोर नवीकरणीय ऊर्जा, स्वच्छ प्रौद्योगिकी, जल एवं कचरा प्रबंधन, कृषि एवं पशुपालन, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, डिजिटकलीकरण, स्मार्ट सिटी व पोत क्षेत्रों में दिया जाएगा।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि मेटे फ्रेडरिक्सन की भारत यात्रा ने दोनों देशों के सामरिक संबंधों को संबल दिया है, उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी डेनमार्क आने का निमंत्रण दिया जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया है। संभावनाएं हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी जल्द ही डेनमार्क का दौरा कर सकते हैं। यात्रा के अंतिम दिन जाते वापस लौटते वक्त डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने कहा भी कि हिंदुस्तान को डेनमार्क अपना एक बेहद करीबी भागीदार मानता है। अपनी यात्रा को उन्होंने द्विपक्षीय संबंधों के लिए एक मील के पत्थर जैसा बताया। उन्होंने उम्मीद भी जताई की यह सिलसिला हमेशा यूं ही चलता रहे। बहरहाल, भारत-डेनमार्क के द्विपक्षीय संबंधों में नियमित तौर पर उच्चस्तरीय आदान प्रदान समय-समय पर होते रहे हैं और मौजूदा यात्रा ऐतिहासिक संबंधों, साझा लोकतांत्रिक परंपराओं और अन्य क्षेत्रों के लिए साझा विचारों के साथ अंतरराष्ट्रीय शांति एवं स्थिरता पर आधारित भी रही। फिलहाल यात्रा के बाद दोनों मुल्कों को और करीबी संबंध मजबूत होने की उम्मीद जगी है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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