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कतर-अरब झगड़े में संतुलित रहे भारत

यह ध्रुवीकरण मुस्लिम देशों के बीच जातीय और क्षेत्रीय हो सकता है।

कतर-अरब झगड़े में संतुलित रहे भारत

कतर से गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल के छह सदस्य देश सऊदी अरब, मिस्र, बहरीन, यमन, लीबिया और संयुक्त अरब अमीरात के राजनयिक संबंध तोड़ने को मध्य-पूर्व व पश्चिम एशिया में नए ध्रुवीकरण के रूप में देखा जा सकता है। यह ध्रुवीकरण मुस्लिम देशों के बीच जातीय और क्षेत्रीय हो सकता है।

इस कूटनीतिक विच्छेद का भारत पर सीधा असर तो नहीं पड़ेगा, लेकिन नए ध्रुवीकरण से मध्य-पूर्व एशिया के मुस्लिम देशों के बीच जातीय व क्षेत्रीय संघर्ष की जंग तेज हो सकती है। खतरा यह है कि यह जंग मध्य-पूर्व व पश्चिम एशिया की असली समस्या कट्टर इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को धीमा कर सकती है।

कतर को कूटनीतिक हाशिये पर डालना सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल का जल्दबाजी में किया गया फैसला लगता है। कारण कतर ने अभी ऐसा कुछ भी नहीं किया है, जिसके लिए उसे इतनी बड़ी सजा दी जा सके।

संबंध विच्छेद के लिए खाड़ी सहयोग परिषद ने जो कारण गिनाए हैं, वे मध्य-पूर्व व पश्चिम एशिया में मुसलमानों के बीच जातीय व क्षेत्रीय विभाजन के संकेत दे रहे हैं। कतर पर कट्टरवाद व आतंक फैलाने वाले इस्लामिक संगठनों की मदद का आरोप लगाया गया है।

उस पर मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड को समर्थन देने का आरोप भी मढ़ा गया है। सऊदी अरब और सयुंक्त अरब अमीरात मुस्लिम ब्रदरहुड आतंकी संगठन का दर्जा देते हैं। कतर को लीबियाई संकट के लिए भी जिम्मेदार ठहराया गया है।

कतर के शेख द्वारा ईरान की तारीफ को भी सऊदी अरब पचा नहीं पा रहा है। हालांकि कतर ने इन सभी आरोपों से इनकार किया है, लेकिन दिलचस्प यह है कि ये सभी घटनाएं दो से तीन साल पूर्व के हैं, जबकि अभी हाल ही में जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सऊदी अरब की यात्रा पर गए थे,

तब जिन पचास मुस्लिम देशों के प्रतिनिधियों को उन्होंने संबोधित किया था, उसमें कतर भी शामिल था। ट्रंप के संबोधन का लक्ष्य मुस्लिम देशों को इस्लामिक स्टेट, अलकायदा, तालिबान और अल शबाब जैसे कट्टर आतंकवादी गुटों के खात्मे के लिए एकजुट करना था।

सऊदी अरब खुद पश्चिम एशिया में जारी आतंकवाद के सफाये के लिए सामूहिक जंग की अगुवाई कर रहा है। एक साल पहले ही उसने 34 मुस्लिम देशों का एक सैन्य गठबंधन बनाया है। इसमें कतर भी शामिल है।

सऊदी अरब कूटनीतिक समझदारी दिखाते हुए इस सैन्य गठबंधन का नेतृत्व पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख जनरल राहिल शरीफ को सौंपा है ताकि उस पर नैतिक दबाव बनाया जा सके। तो फिर कुछ ही दिनों में ऐसा क्या हो गया कि खाड़ी सहयोग परिषद को कतर खलनायक लगने लगा।

इसके पीछे दो वजहें लगती हैं। पहली कम समय में कतर की बड़ी आर्थिक तरक्की और दूसरी ईरान से कतर की नजदीकी। कतर की जमीनी सीमा केवल सऊदी अरब से लगती है। इसलिए संबंध विच्छेद से उसे आर्थिक झटका लग सकता है।

ट्रंप की रियाद यात्रा के बाद पाकिस्तान सरकार को भी शंका है कि सऊदी अरब सैन्य गठबंधन का इस्तेमाल मुस्लिम देशों के बीच जातीय विभाजन के लिए कर सकता है। कतर से कूटनीतिक संबंध तोड़े जाने के बाद पाकिस्तान की शंका को बल मिल रहा है।

मध्य-पूर्व व पश्चिम एशिया में जारी कूटनीतिक जंग में भारत को अति सावधान रहने की जरूरत है। कारण भारत के ईरान, सऊदी अरब, यूएई, कतर, बहरीन व मिस्र से अच्छे संबंध हैं।

हम कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के लिए भी ईरान, सऊदी अरब, यूएई, कतर व कुवैत पर निर्भर हैं। इन देशों में लाखों भारतीय रह रहे हैं और कई भारतीय कंपनियां भी काम कर रही हैं। ऐसे में हमें अपनी आर्थिक हितों को देखते हुए संतुलित रवैया अपनाना ही बेतहर होगा।

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