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कृषि मानसून पर कब तक रहेगी निर्भर

कृषि नीति जल संसाधन के टिकाऊ प्रबंधन पर आधारित होनी चाहिए।

कृषि मानसून पर कब तक रहेगी निर्भर
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भारतीय कृषि और मानसून के बीच एक गैरजरूरी रिश्ता बन गया है। मानसून यदि थोड़ा सा भी कमजोर होता है तो भारतीय अर्थव्यवस्था कांपने लगती है। हमारी अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर है और कम वर्षा के कारण पैदा हुए सूखे से कृषि सेक्टर में आई बदहाली अर्थव्यवस्था के अन्य सेक्टर की सेहत बिगाड़ देती है। मौसम विभाग इस साल मानसून के कमजोर होने की बात स्पष्ट कर चुका है जिसका सीधा अर्थ है कि सामान्य से कम वर्षा होगी। अब तक मानसून सीजन में देश में करीब 45 फीसदी कम बारिश हुई है। लिहाजा भारतीय किसानों पर इसकी मार पड़नी तय है क्योंकि देश में 60 प्रतिशत से अधिक खेती बारिश पर निर्भर है। इसका अर्थ है कि खाद्यान्न उत्पादन में कमी आयेगी, कृषि-उत्पादों के दाम बढ़ेंगे। बड़ी ग्रामीण आबादी की क्रयक्षमता प्रभावित होगी। परिणामस्वरूप गरीबी के दुष्चक्र में फंसे सैकड़ों गांवों को बदहाली के दलदल में जीने को मजबूर होना पड़ेगा।
तथ्य बताते हैं कि देश की कुल गरीब आबादी का 69 फीसदी हिस्सा सिंचाई सुविधा से वंचित क्षेत्रों में रहता है, जबकि सिंचाई की सुविधा से संपन्न क्षेत्रों में गरीबों की संख्या महज दो फीसदी है। हालांकि सरकार ने देश के 500 जिलों में सूखे से निपटने के लिए आकस्मिक योजना बनाई है, जिसे प्रभावी तरीके से लागू करने की चुनौती होगी। नई सरकार कुछ ही दिनों बाद बजट पेश करेगी। अब देखना होगा कि वह मानसून की मार से उबारने के लिए कृषि सेक्टर को क्या सहूलियत देती है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महंगाई के मुद्दे पर गंभीरता दिखा रहे हैं और संबंधित विभागों के मंत्रियों के साथ अब तक तीन बैठक कर प्याज, आलू के निर्यात पर अंकुश लगाने सहित राज्यों को भी जमाखोरों पर कार्रवाई करने के निर्देश दिये हैं।
मानसून के कमजोर होने के बाद ये कदम महंगाई को कितना रोक पाएंगे वक्त ही बताएगा। 2009 में भी तीन दशक का सबसे जबरदस्त सूखा पड़ा था तो उस साल दिसंबर में महंगाई की दर 20 फीसदी तक पहुंच गई थी। इस बार पहले से एलर्ट रहना होगा ताकि वैसे हालात पैदा ना हों। बहरहाल, कृषि का बारिश का मोहताज होना ही सबसे बड़ी समस्या है। देश की कृषि नीति सिंचाई सुविधाओं के मामले में एक दम हाशिए पर खड़ी है। हालांकि पूर्व में वित्त वर्ष 1965-66 और 1987-88 में दो बार सूखा पड़ने के बाद भी भारत सिंचाई के कारण अनाजों के पैदावार बढ़ाने में कुछ हद तक सफल रहा था, तब सिंचाई के लिए भूमिगत जल का उपयोग किया गया था।
आज सबसे पहली प्राथमिकता देश में एक ऐसी सिंचाई नीति विकसित करने की होनी चाहिए जिससे भारतीय कृषि को मानसून के आगे लाचार नहीं रहना पड़े। यह कृषि नीति जल संसाधन के टिकाऊ प्रबंधन पर आधारित होनी चाहिए। हालांकि राष्ट्रपति के अभिभाषण के माध्यम से नई सरकार ने जनता को आश्वस्त किया है कि वह इस साल सामान्य से कम बारिश की आशंकाओं के प्रति सतर्क है। वह प्राथमिकता के आधार पर लंबित सिंचाई परियोजनाओं को पूरा करेगी और हर खेत को पानी उपलब्ध कराएगी। दीर्घकालिक उपाय के रूप में वह नदियों को जोड़ेगी ताकि जल संसाधनों का सर्वोत्कृष्ट उपयोग हो सके और बार-बार बाढ़ और सूखे के खतरे को टाला जा सके।
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