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समाज को आइना दिखाती एक लघुकथा ''दर्पण''

महाराज ने महात्मा को श्रद्धा से नमन किया और वापस लौट गए।

समाज को आइना दिखाती एक लघुकथा
किसी नगर में एक महात्मा की बहुत ख्याति थी। उस नगर के राजा को जब उनके बारे में मालूम पड़ा तो राजा ने उनसे मिलने की इच्छा जाहिर की। पहले दरबार में महात्मा को आने का निमंत्रण दिया गया लेकिन वह नहीं आए। अंत में महाराज ने स्वयं महाज्मा से मिलने का निर्णय किया और उनके पास पहुंचे।
वहां पहुंचकर महाराज ने महात्मा को उपहार स्वरूप पकवान भेंट किए। फिर कुंछ संकोच के साथ पूछा, ‘आपने हमारा निमंत्रण क्यों नहीं स्वीकार किया? हम आपका राजमहल में सम्मान करना चाहते थे।’ यह सुनकर महात्मा कुछ नहीं बोले, उन्होंने एक दर्पण निकाला और उस पर पकवान का एक ग्रास मल दिया। इससे वो दर्पण धुंधला हो गया। फिर अपनी झोली से रोटी का एक टुकड़ा निकाला और उस दर्पण को साफ कर दिया। फिर बड़े चाव से रोटी का टुकड़ा खाने लगे।
यह सब देखकर महाराज विस्मित हो गए। उन्होंने पूछा, ‘महात्मा जी यह सब क्या किया आपने, इसका क्या अर्थ है?’
महात्मा ने मुस्कुराकर समझाया, ‘आपका उपहार, भोजन और राजसी आतिथ्य मेरा दर्पण धुंधला कर सकता है, जबकि मेरी जौ की रोटी उसे साफ कर देती है। अब आप ही बताएं मैं उसे त्याग कर आपका उपहार कैसे स्वीकार करूं?’
सारी बात समझकर महाराज ने महात्मा को श्रद्धा से नमन किया और वापस लौट गए।
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