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काले धन के खिलाफ सख्त नीति अपनाने की जरूरत

सरकार ने दस हजार करोड़ रुपये का टैक्स कलेक्शन किया था।

काले धन के खिलाफ सख्त नीति अपनाने की जरूरत
कालाधन के मोर्चे पर मोदी सरकार को मिली सफलता बताती है कि वह ब्लैकमनी के खिलाफ संजीदा है। केंद्र सरकार की इनकम डिसक्लोजर स्कीम (आईडीएस) के तहत करीब पैंसठ हजार दो सौ पचास करोड़ रुपये की ब्लैकमनी का खुलासा हुआ है। इससे सरकार के खजाने में करीब 30 हजार करोड़ रुपये आएंगे। सरकार ने इस स्कीम के तहत घोषित हाने वाली संपत्ति पर 45 फीसदी टैक्स लगाने का ऐलान किया था।
यह अब तक का सबसे बड़ा खुलासा माना जा सकता है। इससे पहले 1997 में एचडी देवेगौड़ा के कार्यकाल में वित्तमंत्री पी चिदंबरम की ओर से घरेलू आय घोषणा योजना के तहत लोगों ने 33 हजार करोड़ रुपये की अघोषित संपत्ति का ऐलान किया था, उस दौरान 4 लाख से अधिक लोगों ने अपनी अघोषित संपत्ति का ब्योरा दिया था।
सरकार ने 10 हजार करोड़ रुपये का टैक्स कलेक्शन किया था। पिछले साल विदेशों में जमा कालेधन के रूप में केवल 4164 करोड़ रुपये की घोषणा हुई थी, जिससे टैक्स के रूप में केवल 2428 करोड़ रुपये की प्राप्ति हुई थी। दोनों ही स्कीमों की अपेक्षा इस बार अधिक रकम सरकार को मिली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कामकाज के पहले दिन ही ब्लैक मनी का पता लगाने के लिए एसआईटी (स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम) गठित कर संकेत दे दिया था कि आने वाले दिनों कालेधन के प्रति सरकार का रुख सख्त रहने वाला है।
किसी भी अर्थव्यवस्था को घुन की तरह चाटने वाले कालेधन को बाहर लाना सरकारों के लिए हमेशा चुनौती रही है। पिछली सरकारों ने भी ब्लैकमनी का पता लगाने के लिए बड़ा जतन किया था। 2011 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने देश में कालेधन का पता लगाने व उसे बाहर लाने के तरीकों पर विचार करने के लिए एमसी जोशी कमेटी बनाई गई थी। कमेटी ने 2012 में रिपोर्ट भी दी, लेकिन ब्लैकमनी पर सरकार किसी भी तरह अंकुश नहीं लगा पाई।
2011 में सुप्रीम कोर्ट ने भी सख्ती से सरकार से पूछा था कि ब्लैकमनी होल्डरों के नाम क्यों नहीं उजागर किए जाते हैं? 2012 में समाजसेवी अण्णा हजारे ने भ्रष्टाचार और कालाधन को लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ बड़ा आंदोलन किया। भाजपा ने ब्लैकमनी विदेश से वापस लाने को अपना चुनावी मुद्दा बनाया था।
इसलिए केंद्र की सत्ता में आने के बाद से लगातार मोदी सरकार कालाधन के प्रति कठोर रवैया अपनाई हुई है। कालाधन को रोकने के लिए मोदी सरकार ई-ट्रांजैक्शन व प्लास्टिक मनी के अधिक से अधिक इस्तेमाल को बढ़ावा दे रही है व टैक्स स्ट्रक्चर में भी सुधार कर रही है। भारत के अरबों डालर ब्लैकमनी स्विस बैंक समेत टैक्स हैवन देशों में जमा है।
2015 में हुए खुलासे में एसएसबीसी बैंक की जेनेवा ब्रांच में 1195 भारतीयों के खाते मिले। इस साल पनामा पेपर्स लीक में भी 500 भारतीयों के उजागर हुए। हसन अली पर 40 हजार करोड़ रुपये टैक्स चोरी का आरोप है। सीबीआई का अनुमान है कि विदेशी बैंकों में 500 अरब डालर से अधिक ब्लैकमनी जमा है।
भारत में ब्लैकमनी के लिए कॉम्लीकेटेड टैक्स स्ट्रक्चर को जिम्मेदार माना जाता है। वहीं दूसरी सच्चाई यह भी है कि कुछेक भारतीय धनकुबेरों में टैक्स चोरी की प्रवृत्ति भी रही है। टैक्स चोरी से ही कालाधन का सृजन होता है। विश्व में वैध अर्थव्यस्था से बड़ी 'काली अर्थव्यवस्था' है।
काले पैसे के चलते जहां सरकार को टैक्स के रूप में नुकसान होता है, वहीं आतंकवाद, मनी लांड्रिंग, हवाला, बेनामी प्रॉपर्टी, तस्करी आदि को बढ़ावा मिलता है। भारत के बारे में ही अनुमान है कि कुल जीडीपी का 23 से 26 फीसदी ब्लैकमनी है। एशिया में कुल जीडीपी का 28 से 30 फीसदी, अफ्रीका व लैटिन अमेरिका में 41 से 44 फीसदी ब्लैकमनी है। ब्लैकमनी पर सख्ती से निश्चित ही सरकारी खजाने की सेहत सुधरेगी और सरकार विकास पर अधिक खर्च कर सकेगी। लेकिन कालाधन सृजन के खिलाफ सरकार को और कठोर नीति अपनानी चाहिए।
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