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नेपाल से संबंधों को और मजबूत करने पर जोर

अपने संबोधन में मोदी ने कहा कि भारत और नेपाल के संबंध उतने पुराने हैं, जितने हिमालय और गंगा

नेपाल से संबंधों को और मजबूत करने पर जोर
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नेपाल के साथ रिश्तों को नया आयाम देने और द्विपक्षीय संबंधों के एक नये अध्याय की शुरुआत करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिन के नेपाल दौरे पर हैं। इस दौरे के प्रति नेपाल की उत्सुकता इसी से समझी जा सकती है कि हवाई अड्डे पर प्रोटोकॉल तोड़कर खुद नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कोइराला नरेंद्र मोदी का स्वागत करने आए, जहां पर उन्हें 19 तोपों की सलामी भी दी गई। सुशील कोइराला मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में भी शामिल हुए थे।
हाल ही में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी नेपाल यात्रा पर गई थीं। इससे पहले 1997 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने नेपाल की यात्रा की थी। लिहाजा मोदी की यह यात्रा कई मायनों में खास है। पहला, पिछले 17 साल में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली नेपाल यात्रा है। हालांकि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी दक्षेस सम्मेलन में भाग लेने के लिए नेपाल गए थे। दूसरा, उन्होंने रविवार को नेपाल की संविधान सभा (संसद) को संबोधित किया और ऐसा करने वाले वे पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने।
अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि भारत और नेपाल के संबंध उतने पुराने हैं, जितने हिमालय और गंगा। उन्होंने उम्मीद जतायी कि नेपाल जल्दी ही संविधान का निर्माण कर लेगा। साथ ही कहा कि नेपाल विश्व को शांति का संदेश दे रहा है, जहां दुनिया के कई क्षेत्रों में हिंसा का बोलबाला है वहीं नेपाल ने हिंसा छोड़ शांति के रास्ते पर चलने का संकल्प लिया है। प्रधानमंत्री मोदी ने नेपाल को सार्वभौम राष्ट्राय बताते हुए उसे हर क्षेत्र में सहयोग देने की प्रतिबद्धता जता रिश्तों में छाई कड़वाहट को दूर करने का प्रयास किया।
बीते वर्षों में नेपाल में काफी बदलाव आया है। 2006 में जहां राजशाही का अंत हुआ वहीं 2009 में पहली बार माओवादियों की सरकार बनने के बाद नेपाल को धर्मनिरपेक्ष देश घोषित कर दिया गया। हालांकि इसके बावजूद दोनों देशों के संबंधों में हाल के दिनों में ठंडापन आ गया है। इसका फायदा चीन ने उठाया है। पिछले दस वर्षों में चीन और नेपाल के बीच 12 उच्चस्तरीय वार्ता हुई है। वहीं नेपाल में आईएसआई और माओवादियों की भारत विरोधी गतिविधियों ने सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाया है। लिहाजा, लंबित परियोजनाएं जैसे-पंचेश्वर बहुद्देशीय परियोजना, तराई की सड़कों और सीमा पार रेलवे संपर्क कायम करने, बिजली व्यापार समझौता, नेपाल और भारत के संबंधों की आधारशिला रही 1950 की दोस्ती का करार में संशोधन, सीमा विवाद और नेपाल की नदियों के पानी का उचित प्रबंधन आदि ऐसे मुद्दे हैं जिन पर तेजी से आगे बढ़ा जाना चाहिए।
यह सच हैकि भारत-नेपाल संबंधों में काफी उतार-चढ़ाव आये हैं पर भारत के लिए नेपाल महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसके साथ हमारी 1850 किलोमीटर की खुली सीमा है, जो पांच राज्यों से साझा होती है। दोनों देशों की साझी संस्कृति और सभ्यता है। यही वजह है कि हमारे रिश्ते भी राजनीति तथा अर्थव्यवस्था से कहीं आगे हैं परंतु दोनों देश इतने करीब होने के बाद भी क्यों आज इनमें दूरी का अहसास पैदा हो गया है। नरेंद्र मोदी की इस यात्रा से उम्मीद की जानी चाहिए कि बदली हुई परिस्थितियों में दोनों देश फिर से आपसी विश्वास कायम कर पाने में सफल होंगे।
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