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क्या बड़े बदलाव के लिए तैयार है कांग्रेस पार्टी

जम्मू-कश्मीर और झारखंड समेत ग्यारह राज्यों में कांग्रेस सत्ता में है

क्या बड़े बदलाव के लिए तैयार है कांग्रेस पार्टी

जिस तरह से देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी को चुनाव दर चुनाव हार का सामना करना पड़ रहा है वैसे में पार्टी के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम की यह सलाह उचित है कि मौजूदा चुनौतियों को देखते हुए कांग्रेस पार्टी का फिर पुनर्गठन होना चाहिए, लेकिन वर्तमान परिस्थिति में पार्टी में कोई आमूलचूल परिवर्तन संभव लगता नहीं है। क्योंकि इसका मतलब होगा कि नेतृत्व किसी और के हाथ में देना। आज देखा जाए तो कांग्रेस में चाटुकारिता संस्कृति हावी है। उसके नेता जनता में जाने की बजाय हाईकमान को खुश करने में लगे हैं। इस तरह कांग्रेस जमीन से कट रही है। परिवारवाद का मोह और हाईकमान संस्कृति ने हालात को और गंभीर बना दिया है। कांग्रेस के अंदर आज लोकतंत्र का अभाव साफदिखाई दे रहा है। वहीं जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं की भावनाओं को तरजीह न देना भी उसकी लोकप्रियता को कम कर रही है।

आज जम्मू-कश्मीर और झारखंड समेत ग्यारह राज्यों में कांग्रेस सत्ता में है, लेकिन कर्नाटक और केरल को छोड़कर बाकी सात राज्य काफी छोटे हैं और भारतीय राजनीति में कोई अहम भूमिका अदा नहीं करते हैं। इसी से पता चल रहा हैकि कांग्रेस न केवल कमजोर हो रही है बल्कि वह सिमटती जा रही है। इसका अंदाजा इस तथ्य से भी हो जाता है कि कांग्रेस शासित इन ग्यारह राज्यों को मिलाकर भी लोकसभा की कुल 110 सीटें ही बैठती हैं। आने वाले दिनों में जम्मू-कश्मीर और झारखंड में चुनाव होने हैं, लेकिन लगता नहीं कि वहां कांग्रेस अपनी स्थिति बरकरार रख पाएगी। ऐसे में पार्टी का भविष्य बहुत अच्छा नहीं दिखता है। भाजपा ने खुद को समय के साथ न केवल बदला है, बल्कि उसका नेतृत्व भी बदलता गया है, तभी लोकसभा में उसने दो से आज 282 सीटों तक का सफर तय किया है। हो सकता है कि चिदंबरम की सलाह के बाद कांग्रेस में भी बदलाव की कोशिश हो, लेकिन इसकी संभावना कम ही हैकि उसका नेतृत्व भी बदलेगा।

कांग्रेसियों के लिए राहुल गांधी अभी भी पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं। जबकि कांग्रेसी इस तथ्य से आंखें मूंदे हुए हैं कि जिनको वे पार्टी के संकटमोचन का दर्जा दे रहे हैं वे उस भूमिका में दिखते ही नहीं हैं। राहुल गांधी अकसर बड़े मुद्दों पर कुछ बोलने से परहेज करते हैं। साथ ही जब कांग्रेस समस्याओं में घिरी होती है तो उनका अतापता नहीं होता है। साथ ही बड़ी जिम्मेदारी लेने से भी वे दूर भागते दिखते हैं। कांग्रेस की समस्या यह है उसे एकजुट रखने के लिए गांधी परिवार चाहिए, लेकिन इस तथ्य का दूसरा पहलू यह है कि गांधी परिवार अब आम जनता को आकर्षित करने की क्षमता खो चुका है। कुछ लोग जब-तब प्रियंका लाओ पार्टी बचाओ का नारा लगाते रहते हैं, लेकिन उनके आने से भी हालात नहीं बदलेंगे, जब तक संगठनात्मक-संरचनात्मक बदलाव नहीं किए जाएं। बेहतर हो कि कांग्रेसी परिवार से परे भी कुछ सोचें। कांग्रेस में जनाधार वाले काबिल नेताओं की कमी नहीं, लेकिन वे उभर नहीं पा रहे हैं, क्योंकि पार्टी में लोकतंत्र का अभाव बना हुआ है। कांग्रेस को यह समझ लेनी चाहिए कि अब देश की जनता उसके साथ खड़ी होगी जो कुछ करके दिखाने में समर्थ होगा और अपने कामों से भरोसा पैदा करेगा।

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