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चिंतन: ताजपोशी के साथ अमित शाह के समक्ष होंगी चुनौती

शाह का यह पहला पूर्ण कार्यकाल होगा। वे तीन साल तक पार्टी प्रेसिडेंट रहेंगे

चिंतन: ताजपोशी के साथ अमित शाह के समक्ष होंगी चुनौती
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उम्मीद के अनुरूप अमित शाह की फिर से भाजपा अध्यक्ष के तौर पर ताजपोशी हो गई। वे सर्वसम्मति से पार्टी के अध्यक्ष बने हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद उनके नाम का प्रस्ताव रखा। प्रस्तावकों में राजनाथ सिंह, जेपी नड्डा, वेंकैया नायडू, वसुंधरा राजे सिंधिया, रघुबर दास, शिवराज सिंह चौहान भी शामिल रहे। पार्टी अध्यक्ष के चुनाव के मौके पर भाजपा के सभी केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री और बड़े नेता मौजूद रहे। औपचारिक मुहर 28 जनवरी को भाजपा संसदीय बोर्ड की बैठक में लगेगी।
शाह का यह पहला पूर्ण कार्यकाल होगा। वे तीन साल तक पार्टी प्रेसिडेंट रहेंगे। इससे पहले वे पूर्व भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह के अधूरे कार्यकाल को पूरा कर रहे थे। मई 2014 के लोकसभा चुनाव में एनडीए की जीत के बाद जब राजनाथ सिंह केंद्र की मोदी सरकार में गृह मंत्री बनाए गए, तो उनके स्थान पर राजनाथ के शेष कार्यकाल के लिए जुलाई में अमित शाह को भाजपा अध्यक्ष बनाया गया था। उस समय माना गया कि पार्टी की कमान उन्हें लोकसभा चुनाव में यूपी में भाजपा को शानदार कामयाबी दिलाने के लिए तोहफे के तौर पर दी गई थी।
आम चुनाव के समय अमित शाह को यूपी की जिम्मेदारी दी गई थी, जिसमें उनके नेतृत्व में अकेले भाजपा को यूपी की 80 लोकसभा सीटों में से 73 सीटें मिलीं। दो और सीटें अपना दल को मिली थीं, जो भाजपा के साथ ही एनडीए में शामिल है। अध्यक्ष के तौर पर अमित शाह के डेढ़ साल के छोटे से कार्यकाल में भाजपा छह राज्यों में विधानसभा चुनाव लड़ी, जिसमें से चार में उसे जीत मिली और दो में हार। हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और जम्मू-कश्मीर में भाजपा की सरकार बनी, जबकि दिल्ली और बिहार में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा। शाह के कार्यकाल में ही मणिपुर, केरल और लद्दाख जैसे क्षेत्रों में पार्टी का असर पहली बार दिखा और उनके समय में ही भाजपा विश्व की सर्वाधिक सदस्यों वाली पार्टी बनी। फिर भी दो हार के बाद अमित शाह की कुछ आलोचना भी हुई और आवाजें उठने लगीं कि भाजपा को किसी नए नेता को अपना अध्यक्ष बनाना चाहिए। मीडिया के कुछ हिस्सों में यह खबरें भी आईं कि नरेंद्र मोदी और संघ अमित शाह की कार्यशैली से खुश नहीं हैं। हालांकि पार्टी ने हार की सामूहिक जिम्मेदारी ली। अभी भी माना जाता है कि पार्टी का एक धड़ा शाह की सख्त कार्यप्रणाली से असहज महसूस करता है। लेकिन सभी खबरें निराधार साबित हुईं और शाह को पार्टी की कमान मिली। इसमें संघ की भी पूर्ण सहमति रही होगी। इस नए कार्यकाल के साथ ही अमित शाह की नई चुनौती भी शुरू होती है।
अगले दो साल में 10 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। 2016 में पश्चिम बंगाल, असम, केरल, पुड्डुचेरी, तमिलनाडु में चुनाव होंगे, जबकि 2017 में यूपी, पंजाब, गोवा, मणिपुर, उत्तराखंड में चुनाव होंगे। इस समय भाजपा व एनडीए के पास 11 राज्यों में सत्ता है। अब उनके कंधे पर इन दस राज्यों में भाजपा को विजय दिलाने की जिम्मेदारी होगी। खास बात यह है कि इनमें से यूपी, उत्तराखंड और पंजाब के सिवा और कहीं पार्टी का जनाधार नहीं है।
पंजाब में अभी शिरोमणि अकाली दल के साथ सरकार है। इसलिए भाजपा को भी एंटी इन्कंबेंसी का सामना करना होगा। इन राज्यों में भाजपा को अधिक से अधिक जीत चाहिए, ताकि राज्यसभा में पार्टी संख्याबल में बहुमत की ओर बढ़े। शाह के समक्ष अपनी पार्टी के बयानवीर नेताओं पर लगाम लगाने, असंतुष्टों पर नकेल कसने, सरकार के साथ समन्वय बनाए रखने, सरकारों से चुनावी वादों को पूरा कराने और पार्टी के विस्तार की भी चुनौती होगी। पार्टी अध्यक्ष के रूप में असल परीक्षा 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान होगी, जब भाजपा आम चुनाव में एक बार फिर से मोदी सरकार की वापसी को कोशिश कर रही होगी।
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