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तेलंगाना के बहाने चर्चा के केंद्र में छोटे राज्य

तेलंगाना राज्य में हैदराबाद समेत 10 जिले होंगे जबकि आंध्र प्रदेश में 13 जिले होंगे।

तेलंगाना के बहाने चर्चा के केंद्र में छोटे राज्य
दशकों के लंबे संघर्ष के बाद तेलंगाना देश के 29वें राज्य के रूप में स्थापित हो गया है। तेलंगाना के गठन के साथ ही आंध्र प्रदेश कानूनी तौर पर दो हिस्सों में बंट गया है। तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के अध्यक्ष के चंद्रशेखर राव इसके पहले मुख्यमंत्री बने हैं। तेलंगाना राज्य में हैदराबाद समेत 10 जिले होंगे जबकि आंध्र प्रदेश में 13 जिले होंगे। दोनों राज्यों की राजधानी अगले 10 साल तक हैदराबाद ही रहेगी। संसद में इसी साल फरवरी में आंध्र प्रदेश पुनर्गठन विधेयक पारित हुआ था, जिसके बाद अलग तेलंगाना के गठन का रास्ता साफ हुआ था।
इस बंटवारे का जमकर विरोध भी हुआ, लेकिन आखिर में तेलंगाना राज्य बनने में सफल रहा। हाल में हुए विधानसभा चुनावों में टीआरएस के हिस्से तेलंगाना की 119 सीटों में से 63 सीटें आईं और उसे बहुमत मिला। तेलंगाना की मांग बहुत पुरानी थी। वर्ष 1969 में ही इसको पृथक राज्य का दर्जा दिलाने के लिए ‘जय तेलंगाना’ आंदोलन शुरू हुआ था। जिसे अनावश्यक राजनीतिक कारणों से दशकों तक लटकाकर रखा गया था। देश में जब पहली बार राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन हुआ था, तब उसने भी तेलंगाना के सर्मथन में अपनी राय जाहिर की थी। साठ के दशक में जब आंध्र प्रदेश अस्तित्व में आया था, तब तेलंगाना की मांग को लेकर सिर्फ एक आदमी का बलिदान हुआ था, लेकिन आज तेलंगाना बनने तक सैकड़ों नौजवानों की जानें जा चुकी हैं।
धरने-प्रदर्शनों और आंदोलनों से करोड़ों की संपत्ति नष्ट हुई है। खैर अब पीछे मुड़कर देखने की बजाय सरकार को सुशासन और राज्य के विकास पर ध्यान देना चाहिए। अभी बहुत सारे मुद्दे हैं, जिन्हें सुलझाना बाकी है। कृष्ण-गोदावारी का पानी, राजस्व, बिजली और संसाधनों आदि का बंटवारा कैसे होगा? इस पर दोनों तरफ के मुख्यमंत्रियों को विचार करना है। हैदराबाद को विवाद के रूप में छोड़ दिया गया है। 1965 में हरियाणा पंजाब से अलग हो गया था। चंडीगढ़ दोनों की संयुक्त राजधानी बनी। सबको पता है कि चंडीगढ़ को लेकर हरियाणा और पंजाब में आज तक मतभेद कायम है। वर्षों से देश में अलग-अलग क्षेत्रों से छोटे-छोटे राज्यों की मांगें उठ रही हैं। अब उन आंदोलनों में भी तेजी आने की संभावना है। महाराष्ट्र में विदर्भ, पश्चिम बंगाल में गोरखालैंड, असम में बोडोलैंड और उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश तथा पश्चिम प्रदेश के रूप में नए राज्य की मांग लंबे समय से हो रही है। हाल के दिनों में गुजरात से सौराष्ट्र, तमिलनाडु से कूर्ग, ओडिशा से कोशलांचल और बिहार से मिथिलांचल को अलग कर नए राज्य का दर्जा देने की मांग उठी है।
एक-दो अपवादों को छोड़ दें तो छोटे राज्यों में प्रशासन का ढांचा बेहतर रहा है। वहां प्रशासनिक कायरें को सुचारूरूप से चलाने की गुंजाइश ज्यादा होती है, जिससे राज्य में विकास कार्य अबाध रूप से चलते रहते हैं। अब समय आ गया है कि देश में फिर से एक राज्य पुनर्गठन आयोग बने, जो इस बात की पड़ताल करेगा कि देश में विभिन्न क्षेत्रों में छोटे-छोटे राज्यों की मांग कितना तार्किक है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि बड़े राज्यों में प्रशासनिक और विकास कायरें की दृष्टि से स्थितियां अच्छी नहीं होती हैं।
मध्यप्रदेश से अलग होने के बाद छत्तीसगढ़ लगातार विकास पथ पर अग्रसर है। उत्तराखंड की भी स्थिति ठीक है। केवल झारखंड ही छोटे राज्यों की सार्थकता पर खरा नहीं उतर पाया है पर इसके लिए अन्य कारण भी जिम्मेदार हैं। उत्तर प्रदेश को भी चार हिस्सों में बांटने की मांग हो रही है। वाकई यह एक बड़ा राज्य है। यह दुनिया का छठवां सबसे बड़ा राज्य है। इतने बड़े राज्य नहीं होने चाहिए।
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