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फतवा पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के निहितार्थ

कई बार फतवे से मुसलमानों के संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार प्रभावित होते देखे जाते हैं।

फतवा पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के निहितार्थ
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इस्लामिक कानून के तहत मुसलमानों से जुड़े मुद्दे को निपटाने वाली शरीयत अदालतों के फैसलों को सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी मान्यता नहीं दी है। सोमवार को दिए एक ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक कहा है कि किसी तीसरे पक्ष की अपील पर शरीयत अदालतों को फतवा जारी करने का हक नहीं है क्योंकि इनके धार्मिक निर्देशों से मुस्लिम समाज के लोगों के मौलिक अधिकार प्रभावित होते हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि इनको सिर्फ राय देने का हक है, लेकिन इसकी भी कोई कानूनी मान्यता नहीं होगी। इसलिए इनके जारी किए गए फतवे को मानना जरूरी नहीं है। इस फैसले से यह साफ हो गया हैकि कानून की नजर में इनके आदेश और फतवे मुसलमानों के लिए बाध्यकारी नहीं हैं।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने शरीयत अदालतों पर कोई रोक नहीं लगाकर उनकी धार्मिक भावनाओं का भी सम्मान किया है। हिंदू समाज से अलग अकसर देखा जाता रहा है कि शरीयत अदालतें तरत-तरह के फतवे जारी करती रहती हैं जिससे मुस्लिम समाज के बड़े हिस्से के मन में उन्हें मानने या नहीं मानने को लेकर एक तरह का भय और दबाव बना रहता है। ऐसा भी कहा जाता हैकि अधिकांश फतवे न तो तर्कसंगत होते हैं और न ही व्यावहारिक।
कई बार फतवे से मुसलमानों के संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार प्रभावित होते देखे जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए जिसने देश में शरीयत अदालतों की भूमिका स्पष्ट कर दी है। विश्व लोचन मदान ने 2005 में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल कर शरीयत अदालतों की वैधानिकता को चुनौती दी थी। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने गत 25 फरवरी को इस मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया था। शरीयत मुसलमानों का धार्मिक कानून है। जिसके कायदे-कानून कुरान और पैगंबर के वाणियों पर आधारित हैं। शरीयत में राजनीति, अपराध व आर्थिक मामलों के साथ ही व्यक्तिगत मामलों जैसे शादी विवाह, पति-पत्नी संबंध, साफ-सफाई और नमाज तक के तरीकों पर व्यवस्था दी गयी है।
मुस्लिम यह तो मानते हैं कि शरीयत परमात्मा का कानून है लेकिन उनमें इस बात को लेकर बहुत अंतर है कि यह कानून कैसे परिभाषित और लागू होना चाहिए। सुन्नी समुदाय और शिया समुदायों में भी इसे लेकर अलग-अलग विचार हैं। अलग देशों, समुदायों और संस्कृतियों में भी इसको अलग-अलग ढंग से समझा जाता है। शरीयत के अनुसार न्याय करने वाले पारंपरिक न्यायाधीशों को काजी कहा जाता है। कुछ स्थानों पर इमाम भी न्यायाधीशों का काम करते हैं लेकिन अन्य जगहों पर उनका काम केवल अध्ययन करना-कराना और धार्मिक नेता होना है। हालांकि कुछ इस्लामिक देशों में शरीयत अदालतों के फैसलों को कानूनी मान्यता मिली है पर भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और यहां कानून या विधि का शासन है। यह देश के सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होता है। इसमें किसी भी धार्मिक विधानों को स्थान नहीं दिया गया है। इसे लागू कराने के लिए भारत में एक स्वतंत्र न्यायपालिका है। ऐसे में यहां धर्म आधारित शरीयत या फिर दूसरी तरह की अदालतें न्यायपालिका के समानांतर काम नहीं कर सकती हैं।
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