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इंटरनेट पर अमेरिकी पहरे को खत्म करना जरूरी

रूस और चीन ने तो कानून बनाकर अपने देश में इंटरनेट को सुरक्षा कवच पहनाया है।

इंटरनेट पर अमेरिकी पहरे को खत्म करना जरूरी
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इंटरनेट को अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए का प्रोजेक्ट बता कर एक बार इस बहस को तेज कर दिया है कि क्या इंटरनेट सचमुच अभिव्यक्ति की आजादी के लिए सुरक्षित मंच है या यह आजादी देने के बहाने लोगों और राष्ट्रों की निजता तथा गोपनीयता को भेदने का अस्त्र है। इंटरनेट को गोपनीयता में सेंध का औजार मानकर ही पुतिन ने रूसियों को अमेरिका नियंत्रित गूगल सर्च के प्रति सचेत किया है। पुतिन ने कहा कि वल्र्ड वाइड वेब (डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू) को सीआईए ने विकसित किया था और अब भी इस पर अमेरिका का नियंत्रण है।
रूसी राष्ट्रपति ने तर्क दिया कि पूर्व सीआईए कर्मी एडवर्ड स्नोडेन की ओर से अमेरिका द्वारा इंटरनेट की जासूसी का जो भंडाफोड़ किया गया है उससे साबित होता है कि अमेरिका सूचना पर अंतर्राष्ट्रीय वर्चस्व के गोपनीय अभियान में संलिप्त है। इंटरनेट पर निजता और गोपनीयता को लेकर पुतिन की चिंता केवल रूसी हित तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दुनिया के सभी देशों की समस्या है। भारत भी अमेरिका के इंटरनेट रडार पर है। स्नोडेन के कई विकिलीक्स खुलासे से यह साफ भी हो चुका है। ब्लैकबेरी के अभेद्य एसएमएस मामले में भी रक्षा सुरक्षा को लेकर ही भारत और ब्लैकबेरी सेवा देने वाली कनाडाई कंपनी रिसर्च इन मोशन के बीच ठनी थी।
17 देशों में किए गए बीबीसी के एक सर्वे में भी 52 प्रतिशत लोगों ने माना कि अभिव्यक्ति के लिए इंटरनेट सुरक्षित जगह नहीं है। इंटरनेट डोमेन यानी वेबसाइट पता जारी करने वाली संस्था, आईकैन (इंटरनेट कॉरपोरेशन फॉर असाइंड नेम्स एंड नंबर्स) जैसी इंटरनेट की मूलभूत कंपनियां अमेरिका में हैं, सर्च इंजन गूगल, विकिपिडिया, याहू, सोशल वेबसाइट फेसबुक, ट्विटर भी अमेरिका में हैं। जीमेल गूगल की सेवा है। इसलिए आज देखा जाय तो इंटरनेट के 90 फीसदी हिस्सों पर अमेरिका का नियंत्रण है। चीन, रूस और इंडोनेशिया समय समय पर इंटरनेट के अमेरिकी नियंत्रण पर सवाल उठाते रहे हैं।
रूस और चीन ने तो कानून बनाकर अपने देश में इंटरनेट को सुरक्षा कवच पहनाया है, लेकिन इससे इंटरनेट पर सरकारी नियंत्रण के हावी होने के खतरे के चलते इसका विरोध भी होता रहा है। 2005 में इंटरनेट गवर्नेंस पर विचार के लिए ट्यूनिशिया में एक सम्मेलन हुआ था, जिसमें विश्व स्तर पर अभिव्यक्ति की आजादी सुनिश्चित करने और किसी भी नियंत्रण के एकाधिकार को समाप्त करने के लिए एक फोरम के गठन का संकल्प लिया गया था, इसे ट्यूनिस एजेंडा कहा गया था, जिस पर अमल होना बाकी है। यह भी सोचने वाली बात है कि इंटरनेट सुविधा उपलब्ध कराना खर्चीला काम है और अगर अमेरिका इस पर अकूत धन खर्च कर रहा है तो बिना मकसद तो करेगा नहीं। अब देशों को सोचना है कि उसे अपनी सुरक्षा कैसे करनी है। तमाम इंटरनेट सेवाओं को संयुक्त राष्ट्र के नियंत्रण में लाया जा सकता है, लेकिन इस पर हर हाल में अमेरिकी नियंत्रण खत्म करना जरूरी है।
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