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पुलिस सुधार के प्रति उदासीनता ठीक नहीं

पूरे देश में औसत एक लाख जनसंख्या पर महज 106 पुलिसकर्मी उपलब्ध हैं। इन पर नागरिकों की सुरक्षा का जिम्मा भी है और जांच का भी।

पुलिस सुधार के प्रति उदासीनता ठीक नहीं
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पुलिस के कंधों पर देश की कानून व्यवस्था को संभालने व सुरक्षा देने का जिम्मा है, लेकिन वह स्वयं ही काम के बोझ तले दबी है। यह सच्चाई है कि आज अत्यधिक दबाव में पुलिसकर्मी अपना काम भी सामान्य तरीके से नहीं कर पा रहे हैं। वैसे तो अन्य कर्मचारियों की तरह पुलिस की ड्यूटी भी आठ घंटे होनी चाहिए, लेकिन पुलिस अनुसंधान और विकास ब्यूरो के ताजा सर्वे के मुताबिक 90 फीसदी पुलिसकर्मी इससे कहीं अधिक समय तक ड्यूटी करते हैं।

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वहीं लगभग दो तिहाई पुलिसकर्मियों को तो एक भी साप्ताहिक अवकाश तक नहीं मिलता है। वहीं 80 फीसदी पुलिसकर्मियों ने माना है कि वीआईपी सुरक्षा या आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए उन्हें छुट्टी से बुलाकर ड्यटी पर लगा दिया जाता है। कामकाज का बोझ उनमें तनाव पैदा कर रहा है। इसका दुष्प्रभाव उनके मन और शरीर पर पड़ रहा है।

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दरअसल, इसकी वजह देश में पुलिसकर्मियों की संख्या जरूरत से कम होना है। आज मामला राष्ट्रीय राजधानी का हो या पूरे देश का, पुलिस के सामने बड़ी समस्या उसकी संख्या बल में कमी है। पूरे देश में औसत एक लाख जनसंख्या पर महज 106 पुलिसकर्मी उपलब्ध हैं। इन पर नागरिकों की सुरक्षा का जिम्मा भी है और जांच का भी। बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल आदि राज्यों में तो हालात और भी बदतर हैं। वहां यह आंकड़ा सौ से भी नीचे है। जबकि संयुक्त राष्टÑ के अनुसार प्रति एक लाख आबादी पर कम से कम 222 पुलिसकर्मी होने चाहिए। हालांकि आज समूचे पुलिस तंत्र में सुधार की दरकार है। मसलन उसकी कार्यप्रणाली, वर्किंग आॅवर, प्रशिक्षण एवं इंफ्रास्ट्रक्चर से संबंधित तमाम सुधार की आवश्यकता है।

पुलिस व्यवस्था में व्याप्त खामियों का प्रभाव न सिर्फ आम जनता और पीड़ित पक्ष पर पड़ रहा है, बल्कि पुलिस तंत्र की दक्षता और निष्पादन में भी ह्रास हो रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने 2006 में पुलिस में व्यापक सुधार के निर्देश दिए थे। आठ वर्ष से अधिक समय बीतने के बावजूद राज्य पुलिस सुधार संबंधी न्यायालय के विस्तृत निर्देश लागू नहीं कर सके हैं। दरअसल, पुलिस और कानून व्यवस्था राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। पर्याप्त पुलिस बल न होने के कारण देश में विभिन्न अपराधों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है।

इसके बावजूद राज्य सरकारें पुलिस विभाग में खाली पद भरने के मामले में न जाने क्यों उदासीनता बरत रही हैं? इसी कारण पुलिस कर्मचारियों को पूरा सप्ताह और लम्बी अवधि तक ड्यूटी करनी पड़ती है। जिसके परिणामस्वरूप वे अपने काम में लापरवाही और असावधानी बरतने लगते हैं। पुलिसकर्मियों के कंधों पर से भी काम के बोझ कम होने चाहिए, ताकि वे अपने परिवार और समाज को अधिक समय दे सकें। अन्य सरकारी सेवाओं की तुलना में उन्हें मिलने वाली सुविधाएं भी कम हैं जिससे पुलिस विभाग में असंतोष और भ्रष्टाचार में वृद्धि हो रही है।

अत: देश में पुलिस बलों की कमी जितनी जल्दी पूरी की जाएगी, अपराधों तथा अन्य सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करके आम जनता में सुरक्षा की भावना उत्पन्न करने में उतनी ही सहायक होगी। विशेषज्ञों का कहना है कि ज्यादा पुलिसकर्मियों की मौजूदगी से न केवल स्ट्रीट क्राइम जैसे रेप, चोरी, हत्या आदि पर रोक लगाने में मदद मिलती है, बल्कि आतंकवादी घटनाओं पर भी बहुत हद तक अंकुश लगा सकते हैं।

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