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पटेल आरक्षण आंदोलन हिंसक होना दुर्भाग्यपूर्ण

पीएम मोदी की अपील का पटेल समुदाय पर कोई असर नहीं दिखा। हिंसा के बीच सेना ने फ्लैग मार्च।

पटेल आरक्षण आंदोलन हिंसक होना दुर्भाग्यपूर्ण
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गुजरात में ओबीसी के तहत आरक्षण की मांग को लेकर पाटीदार (पटेल) समुदाय का आंदोलन हिंसक होना दुर्भाग्यपूर्ण है। पुलिस के साथ झड़प में एक शख्स की मौत हो गई है। वहां हालात इतने बिगड़ गए हैं कि आंदोलनकारियों को काबू में करने के लिए अर्धसैनिक बलों को बुलाना पड़ा है। इससे पहले मंगलवार को आरक्षण के सर्मथन में अहमदाबाद में पटेल समुदाय के लोगों की भारी भीड़ उमड़ी थी, उससे साफ है कि इस समुदाय के लोग एकजुट हो गए हैं। 22 वर्षीय हार्दिक पटेल इस समुदाय की आवाज बनकर उभरे हैं। हालांकि भले ही वे रैलियों में आरक्षण की बात कर रहे हैं, लेकिन उनकी मंशा कुछ और ही दिखती है। गुजरात में पटेल अगड़ी जाति में गिने जाते हैं। राज्य की आबादी में इनकी हिस्सेदारी बीस फीसदी है। सामाजिक और आर्थिक दोनों ही मोचरें पर इनका खासा प्रभाव है। रियल एस्टेट, हीरा उद्योग, शिक्षा जगत से लेकर कृषि के क्षेत्र में इनकी मजबूत उपस्थिति है। इन सबके अलावा राजनीतिक रूप से भी यह समुदाय काफी संगठित है। 182 सदस्यीय गुजरात विधानसभा में 30 विधायक पटेल समुदाय से ही हैं।

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प्रदेश में मौजूदा मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल के अलावा छह मंत्री इसी समुदाय की अगुआई करते हैं। इस समुदाय की यह स्थिति आरक्षण के मामले में सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों में फिट नहीं बैठती। सुप्रीम कोर्ट कह चुका हैकि सिर्फ जाति ही आरक्षण पाने का आधार नहीं हो सकती, बल्कि उस समुदाय को सामाजिक आर्थिक कसौटियों पर भी कसा जाना चाहिए। इस पैमाने पर पाटीदार (पटेल) समुदाय आरक्षण के दायरे में नहीं आ पाएगा। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार आरक्षण की उनकी मांग को खारिज कर चुकी है। इसके बावजूद हार्दिक पटेल ओबीसी की सूची में पटेल को शामिल करने की मांग कर रहे हैं। हालांकि वे इस आंदोलन को राजनीति से जोड़कर नहीं देखने को कह रहे हैं, लेकिन कहा जा रहा हैकि आरक्षण के नाम पर वे अपना राजनीतिक हित साधने की कोशिश कर रहे हैं। बहरहाल, उनका उद्देश्य जो भी हो, इस आंदोलन हो हिंसक होने से बचाया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी आंदोलनकारियों से शांति बनाए रखने की अपील की है। हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं है।

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राज्य सरकार को भी बातचीत कर जल्द से जल्द कोई रास्ता निकालने की कोशिश करनी चाहिए। दूसरी ओर आज देश में आरक्षण की पूरी व्यवस्था पर मंथन करने की जरूरत है। मंडल आयोग की सिफारिश के बाद देश में ओबीसी के लिए अलग से 27 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था लागू की गई थी। तब उम्मीद की गई थी कि इससे अनुसूचित जाति और जनजाति से अलग जो वर्ग विकास की दौड़ में पीछे छूट गए हैं उन्हें सामाजिक न्याय मिल सकेगा, लेकिन आज 25 साल बीतने के बाद भी देश में सामाजिक न्याय का नारा थमने के बजाय तेज ही हो रहा है। आरक्षण को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के कारण भी हालात काफी जटिल होते गए हैं। आज देश को आरक्षण से कहीं ज्यादा जरूरत विभिन्न क्षेत्रों में अवसर पैदा करने की है।

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