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चिंतन: खेल को जंग की तरह लेंगे तो यही सब होगा

मामला भारत और पाक के बीच का हो तो इसकी तीव्रता कुछ ज्यादा ही अनुभव की जाने लगती है।

चिंतन: खेल को जंग की तरह लेंगे तो यही सब होगा

नई दिल्ली. अपने वतन से भला किसे प्यार नहीं होता? बहुत से मामलों में भले ही यह उस तरह प्रकट नहीं होता हो, जैसी अपेक्षा रहती है परन्तु जब राष्ट्र की प्रतिष्ठा, सुरक्षा, एकता और अखंडता का प्रश्न सामने हो तो यह मुहब्बत एक ऐसे जज्बे में तब्दील होती नजर आने लगती है, जिसे देखकर कोई भी गर्व महसूस करे। मामला भारत और पाक के बीच का हो तो इसकी तीव्रता कुछ ज्यादा ही अनुभव की जाने लगती है।

हालांकि इसके ऐतिहासिक, राजनीतिक और कुछ दूसरे कारण भी हैं परन्तु कई बार चीजें जब सीमाएं लांघने लगे तो लगता है कि ये तो कुछ ज्यादा ही हो गया है। यह सही है कि दोनों तरफ ऐसे लोगों और परिवारों की कमी नहीं है, जिन्होंने विभाजन की त्रासदी में अपना बहुत गंवा दिया था। इनमें से अधिकांश उन चीजों को भुलाकर आगे बढ़ चुके हैं परन्तु कुछ हैं, जो आज भी कोई घटना होने पर बदले की भावना से तैश में आ जाते हैं। यह निर्विवाद सत्य है कि भारत-पाक पड़ोसी मुल्क हैं।

दूसरा सच ये है कि कोई अपने पड़ोसी को बदल नहीं सकता। अक्सर कही जाती है कि कुछ चीजों को छोड़ दें तो दोनों मुल्कों में बहुत सी समानताएं हैं। दोनों एक-दूसरे की जबान समझते हैं। पहनावा, खान-पान, रीति-रिवाज से लेकर कई दूसरी चीजों में लगभग एकरूपता है। दोनों के बीच 1947-48, 1965, 1971 और 1999 में हुए चार युद्धों और सीमा पार से लगातार परोसे जा रहे आतंकवाद के चलते जो स्थितियां उत्पन्न हुईं, उसके चलते एक-दसरे पर भरोसा करने की तमाम कोशिशें पटरी से उतरती रही हैं। मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, दिल्ली, हैदराबाद से लेकर तमाम शहरों में हुए आतंकी हमलों ने अविश्वास की खाई को और चौड़ा किया है।

सीमा पार से भारत विरोधी मुहिम चलाने वाली जमातों को जिस तरह वहां सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई और सत्ता का संरक्षण मिलता रहा है, उसकी वजह से भी दोनों देशों के बीच दुश्मनी खत्म नहीं हो सकी। अलग-अलग मौकों पर कुछ प्रधानमंत्रियों ने गंभीर कोशिशें की हैं परन्तु सफलता नहीं मिली। जब-जब ऐसे प्रयास किए गए, तब आतंकी जमातों ने उनमें पलीता लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सरहद पर तनाव इस कदर है कि दोनों के बीच खेल प्रतियोगिताएं तक स्थगित पड़ी हैं। कभी-कभार जब अंतरराष्ट्रीय खेलकूद प्रतियोगिताएं होती हैं, तब दोनों देशों की टीमें जरूर उसमें हिस्सा लेती हैं।

जब भी दोनों देशों के बीच क्रिकेट, हॉकी वगैरा के मुकाबले होते हैं, तब नागरिकों की भावनाएं अपने चरम पर होती हैं। हालांकि पूर्व के वर्षों में भी उत्तेजना होती थी परन्तु हाल के वर्षों में जिस तरह इलेक्ट्रोनिक और सोशल मीडिया का प्रसार बढ़ा है, उससे मैच शुरू होने से पहले ऐसा माहौल तैयार कर दिया जाता है, मानों दोनों देशों की दो टीमें आमने-सामने न होकर सेनाएं सरहद पर खड़ी हो गई हैं। खेल को खेल भावना से खेला जाना चाहिए। खेल को खेल ही बने रहने देना चाहिए। उसे जंग में तब्दील कर देंगे, तो यही हालत होगी जो इन दिनों दिखाई दे रही है।

कोलकाता में टीम इंडिया ने पाकिस्तानी टीम को क्या हराया, सीमा पार कई लोगों ने गुस्से में अपने टीवी सेट तोड़ दिए। पाक क्रिकेट बोर्ड ने लोगों के गुस्से को शांत करने के मकसद से ऐलान कर दिया कि शाहिद अफरीदी को कप्तानी से हटा दिया जाएगा। यही नहीं, भारत में मैच की कमेंट्री कर रहे पूर्व क्रिकेटर शोएब अख्तर सिर्फ इस बात पर एंकर पर भड़क उठे कि पाक की हार के बाद वह अख्तर की ओर देखकर जरा मुस्कुरा दिए थे। ये घटनाएं बताती हैं कि हालात सही नहीं हैं। इन्हें सही करने की जरूरत है। खेल को खेल की तरह लेंगे, जंग की तरह नहीं तो ये बहुत जल्दी सही हो सकते हैं।

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