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मोदी सरकार में शून्य के स्तर पर पहुंची महंगाई

महंगाई को काबू में लाने के लिए मोदी सरकार द्वारा उठाए गए कदम भी काफी कारगर साबित हुए हैं

मोदी सरकार में शून्य के स्तर पर पहुंची महंगाई
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जिस महंगाई ने पांच वर्षों तक कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के नाक में दम कर रखा था और गत लोकसभा चुनावों में बड़ा मुद्दा बना था वह अब भाजपा की अगुवाई वाली एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद पस्त होती दिख रही है। नवंबर में थोक मूल्यों पर मापी जाने वाली महंगाई की दर गिरकर शून्य हो गई है जबकि अक्टूबर में यह 1.77 फीसदी के स्तर पर थी। इससे पहले जुलाई 2009 में थोक महंगाई शून्य से नीचे गई थी। देश में मई में केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद इसमें लगातार गिरावर्ट दर्ज की गई है।

भले ही विपक्ष के कुछ लोग इसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल और जिंसों की गिरती कीमतों की बड़ी भूमिका मान रहे हैं, परंतु यह भी सच हैकि महंगाई को काबू में लाने के लिए मोदी सरकार द्वारा उठाए गए कदम भी काफी कारगर साबित हुए हैं। सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार ने कीमतों को नियंत्रण में लाने के लिए कई कदम उठाए। प्याज और आलू जैसे खाद्य पदार्थों की जमाखोरी रोकने के लिए इन्हें आवश्यक वस्तुओं के दायरे में लाया गया। बड़ी मात्रा में चावल व गेहूं राज्यों को मुहैया कराए गए।

महंगाई को नियंत्रित रखने के लिए 500 करोड़ रुपये के कीमत नियंत्रण कोष बनाने की घोषणा हुई। इसके साथ ही बदली वैश्विक परिस्थितियों के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल व जिंसों की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई है। इसका सीधा प्रभाव घरेलू बाजार पर पड़ा है, क्योंकि पेट्रोल व डीजल सहित सभी तरह के र्इंधन सस्ते हो गए हैं। महंगाई और र्इंधन की कीमतों में प्रत्यक्ष संबंध होता है। इन सबका प्रभाव यह हुआ है कि देश में खाने-पीने की चीजों की कीमतें भी कम होने लगी हैं। जैसे-नवंबर में प्याज के दामों में 56 फीसदी, सभी सब्जियों में 29 फीसदी और गेहूं की कीमत में करीब तीन फीसदी की गिरावट आई है।

जाहिर है, लंबे समय से महंगाई की मार झेल रही देश की आम जनता अब थोड़ी बहुत राहत की उम्मीद तो कर ही रही होगी। हालांकि यह भी सच है कि भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए महंगाई का शून्य या उससे कम होना उचित नहीं माना जाता है। विशेषज्ञ इसे अर्थव्यवस्था में संकुचन आने की स्थिति से भी जोड़ रहे हैं। ऐसे में अर्थव्यवस्था में मंदी के हालात बन जाते हैं। अर्थात उपभोक्ता मांग में कमी आ जाती है, जिसकी वजह से औद्योगिक उत्पादन भी गिर जाता है। लिहाजा शून्य मुद्रास्फीति यह भी संकेत दे रही है कि अब विकास दर में गति लाना जरूरी है। घटती महंगाई और औद्योगिक उत्पादन में कमी को देखते हुए रिजर्व बैंक पर दबाव है।

दरअसल, अक्टूबर में औद्योगिक उत्पादन में 4.2 फीसदी की गिरावट आई थी।वित्तमंत्री अरुण जेटली कई मौकों पर रिजर्व बैंक को ब्याज दरों में कमी करने की सलाह दे चुके हैं। उद्योग जगत भी ब्याज दरों में कमी की लगातार मांग कर रहा है। अब अर्थव्यवस्था में गति देने का दारोमदार रिजर्व बैंक और केंद्र सरकार के कंधों पर है। दोनों को अपने-अपने स्तर पर नए निवेश लाने और मांग पैदा करने के लिए प्रयास करने की जरूरत है। इसके लिए रिजर्व बैंक को ब्याज दरों में कटौती करनी होगी और केंद्र सरकार को आर्थिक सुधारों की गति तेज करनी होगी।

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