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भारत का हिंसक देशों की सूची में होना दुखद

आज भारत आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर जूझ रहा है।

भारत का हिंसक देशों की सूची में होना दुखद
ग्लोबल पीस इंडेक्स (जीपीआई)-2014 में भारत को दुनिया के 20 सबसे अधिक हिंसक देशों में शुमार किया गया है। ऐसे देशों में अपराध, हिंसा, अशांति और टकराव का बोलबाला होता है और ये नागरिकों के लिए असुरक्षित माने जाते हैं। दुनिया को शांति का संदेश देने वाले गौतम बुद्ध और महात्मा गांधी के इस देश के लिए इससे शर्मनाक बात आखिर क्या हो सकती है कि आपराधिक घटनाओं और हिंसा के मामले में भारत आम तौर पर हिंसक माने जाने वाले सीरिया, इराक, दक्षिणी सूडान, पाकिस्तान, नाइजीरिया और अफगानिस्तान जैसे मुल्कों से जरा-सा ही पीछे है।
जीपीआई-2014 में 162 हिंसक देशों में भारत 143 वें स्थान पर है। शांतिपूर्ण देशों के मामले में भूटान, नेपाल और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों से भारत बहुत पीछे है। रिपोर्ट के अनुसार आइसलैंड दुनिया का सर्वाधिक शांतिपूर्ण और सीरिया दुनिया का सबसे हिंसक देश है। हिंसा के कारणों के बारे में इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक एंड पीस की यह रिपोर्ट बताती है कि भारत में हिंसा आंतरिक और बाहरी, दोनों वजहों से है। इसके कार्यकारी अध्यक्ष स्टीव कीलेलिया पड़ोसी देशों की ओर से होने वाली हिंसक वारदातें, जम्मू-कश्मीर में हिंसा और नक्सलवाद की समस्या को इसके लिए कसूरवार ठहराते हैं।
हाल के दिनों में आपराधिक गतिविधियों में समाज की प्रत्यक्ष भागीदारी कम हुई फिर भी सरकारी स्तर पर काफी प्रयास की जरूरत है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह गंभीर चिंता का विषय जरूर है कि पिछले सात वर्षों में विश्व शांति का ग्राफ चार फीसदी गिरा है अर्थात विश्व समग्र रूप से हिंसा की ओर बढ़ रहा है। रिपोर्ट में एक बात और बहुत स्पष्ट रूप से सामने आई है कि शांति की तरफ बढ़ने वाले देशों के मुकाबले हिंसा की ओर बढ़ने वाले देशों की संख्या में इजाफा हो रहा है। जिस तरह इराक, नाइजीरिया, अफगानिस्तान, सीरिया व पाकिस्तान में आतंकवादी बर्बर कार्रवाइयों को अंजाम दे रहे हैं, वह इसकी पुष्टि करता है। हिंसा से धन-जन दोनों की हानि हो रही है।
रिपोर्ट के अनुसार गत वर्ष हिंसक गतिविधियों के परिणामस्वरूप भारत की अर्थव्यवस्था को 1.07 लाख करोड़ रुपये (जीडीपी का 3.6 फीसदी) का नुकसान हुआ। वहीं वैश्विक अर्थव्यवस्था को 9.8 खरब डॉलर (वैश्विक जीडीपी का 11.3 प्रतिशत) का नुकसान झेलना पड़ा। भारत जैसे सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता वाले देशों को इस मामले में गंभीरता से सोचना होगा। भारत को उन दोषों के निवारण के लिए सार्थक प्रयास करने होंगे जिनकी वजह से अशांत राष्ट्रों की सूची में है। अशिक्षित, बेरोजगार और गरीब नागरिकों को अपराध सहज अपनी ओर खींचता है।
आज भारत आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर जूझ रहा है। देश में नक्सलवाद फैलने की एक बड़ी वजह विकास की प्रक्रिया में आदिवासियों के पिछड़ जाने को भी माना जा रहा है। उन्हें मुट्ठीभर लोग व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर आसानी से गुमराह कर लेते हैं। इससे निपटना तभी संभव है जब उनमें व्यवस्था के प्रति विश्वास पैदा होगा। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह सुरक्षा इंतजामों को पुख्ता करने के साथ-साथ हिंसा के कारणों का भी समाधान करे। हमारी संस्कृति का सरोकार सभ्य और शांतिपूर्ण समाज से जुड़ा रहा है, लेकिन जीपीआई की रिपोर्ट बता रही है कि देश में वसुधैव कुटुंबकम की भावना दम तोड़ रही है। इसके लिए सर्वपक्षीय प्रयास की जरूरत है।
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