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भारत-चीन संबंधों को ऊंचाई देने का संकल्प

व्यापार असंतुलन को लेकर मोदी की चिंता को जिनपिंग ने दूर करने का वचन दिया।

भारत-चीन संबंधों को ऊंचाई देने का संकल्प
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नई दिल्ली. आबादी के लिहाज से दुनिया के दो सबसे बड़े भाई ‘हिंदी-चीनी’ आत्मविश्वास और आपसी भरोसे से लबरेज होकर मिले, गिले-शिकवे दूर करने की कसमें खार्इं और साथ चलकर विकास की नई इबारत लिखने का वादा किया। भारत और चीन के बीच हुई शिखर वार्ता के दौरान कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला। भारतीय सीमा के अंदर चीनी घुसपैठ के साये में हुई इस शिखर वार्ता के दौरान 21वीं सदी में दोनों उभरती महाशक्ति के नेता नेहरू युग की प्रेतछाया को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने के प्रति कृतसंकल्पित दिखे। दोनों ही नेताओं पर 1962 का साया नहीं दिखा, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने एक स्वर में अपने-अपने देशों और शेष दुनिया को भरोसा दिलाया कि राष्ट को प्रगति के पथ पर ले जाने के लिए चहुंओर शांति और सहयोग जरूरी है। सीमा पर भी।

इस शिखर वार्ता से ठीक पहले पीएम मोदी ने जिस सफाई से शी के साथ अहमदाबाद में अनौपचारिक बातचीत कर उन्हें सहज किया और फिर वार्ता के दौरान व साझा प्रेसवार्ता में दृढ़ होकर चीनी घुसपैठ और सीमा विवाद को हल करने को लेकर भारत की चिंता से चीन को अवगत कराया, इससे ब्रिक्स और जापान के बाद एक बार फिर मोदी की कूटनीतिक चुतराई परिलक्षित हुई है।ब्राजील में ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान मोदी ने जिस तरह चीन के ब्रिक्स बैंक में 100 अरब डालर पूंजी देने के मंसूबे पर पानी फेरकर और जापान में इशारों-इशारों में चीन को विस्तारवाद की नीति से नहीं विकासवाद की नीति से ही दुनिया की समस्त मानवजाति का कल्याण संभव का आईना दिखा कर अपनी कूटनीतिक परिपक्वता का संदेश दिया था,

उसका ही असर था कि इस बार जब चीनी राष्टाध्यक्ष भारत आए तो उन्होंने हर पल बराबरी के स्तर पर बात की और जल्द से जल्द सीमा विवाद को हल करने के लिए भारत से बात करने का वचन दिया। मोदी और जिनपिंग ने जिस तरह भारत और चीन के बीच जारी सीमा विवाद को दूर करने के प्रति संकल्प जताया है और आपस में एक मुश्त 12 करार कर दोनों देशों के आर्थिक-व्यापारिक-सांस्कृतिक रिश्तों पर इस विवाद की छाया नहीं पड़ने देने का कूटनीतिक संदेश दिया है, उससे एशिया में नई उम्मीद बंधी है। भारत को अपने विकास इंजन दौड़ाने के लिए सस्ती तकनीक और पूंजी दोनों की दरकार है। चीन से हुए 12 करार से इस दिशा में मदद मिलेगी। दोनों देशों में व्यापारिक, दवा निर्माण और दवा आयात, रेल के विकास में मदद, कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए चीन के रास्ते सेफ रास्ता देने, कस्टम क्षेत्र, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, मुंबई को शंघाई जैसा बनाने, आॅडियो-विजुअल क्षेत्र, दो इंडस्ट्रियल पार्क बनाने तथा अंतरिक्ष क्षेत्र में अहम करार हुए।

व्यापार असंतुलन को लेकर मोदी की चिंता को भी जिनपिंग ने दूर करने का वचन दिया और पांच साल में 20 अरब डालर भारत में निवेश की घोषणा की। यह जापान के 35 अरब डालर से बड़ा निवेश तो नहीं है, लेकिन शी ने भारतीय कंपनियों के लिए चीन में अधिक मौके देने की बात कही। उम्मीद की जानी चाहिए कि इन करारों से दोनों देशों के संबंधों को विश्वासबहाली की नई ऊंचाई मिलेगी।

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