Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

लोकतंत्र की मर्यादाओं का उल्लंघन क्यों

चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद चुनाव आयोग को कई अहम फैसले लेने के अधिकार मिल जाते हैं।

लोकतंत्र की मर्यादाओं का उल्लंघन क्यों
X
लोकसभा चुनाव को भारतीय लोकतंत्र के महाकुंभ का दर्जा प्राप्त है। महज पांच वर्षों के अंतराल में इसे संपन्न करा लेना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि इसमें स्वतंत्रता, पारदर्शिता और निष्पक्षता भी जरूरी है। इसके लिए चुनाव आयोग, जो संवैधानिक संस्था है, ने कुछ आदर्श आचार संहिता के रूप में नियम कायदे, दिशा-निर्देश और र्मयादाएं भी निर्धारित किया है। यह महापर्व तभी अपनी सार्थकता और पवित्रता बनाए रखेगा जब उम्मीदवार इसका अक्षरश: पालन करेंगे परंतु दुर्भाग्य है कि लोकतंत्र के सुनहरे भविष्य को गढ़ने की जिम्मेदारी जिनके कंधों पर है, वे ही इसकी बुनियाद को मौके बेमौके ठेंगा दिखाते हैं।
विभिन्न पार्टियों के कुछ नेता जैसे यह मान चुके हैं कि आयोग भले ही कुछ भी कह ले वे तो अपने हिसाब से ही चुनाव प्रचार करेंगे और इस क्रम में वे ओछी टिप्पणी करने से भी नहीं चूकेंगे। मंगलवार को एक चुनावी सभा के दौरान उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के सरकार में मंत्री आजम खान ने सेना में जाति-धर्म को लेकर जो आपत्तिजनक टिप्पणी की है, वह निंदनीय है। भारतीय सेना धर्मनिरपेक्षता की मिसाल है। लिहाजा सेना को राजनीति में घसीटने से देश में एक खतरनाक प्रवृत्ति की शुरुआत हो सकती है। पूर्व सेना अध्यक्ष और गाजियाबाद से भाजपा के उम्मीदवार वीके सिंह ने उचित ही कहा हैकि कारगिल की लड़ाई भारत के लिए भारतीयों ने जीती थी।
इससे पहले भी अलग-अलग पार्टी के नेताओं ने गलतबयानी की है। अभी भी यह सिलसिला जारी है। हर बार चुनावों में आयोग के समक्ष आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के ऐसे सैकड़ों मामले आते हैं। इसके लिए राजनीतिक दलों व प्रत्याशियों को नोटिस भी दिए जाते हैं, लेकिन मामला माफी मांगने तक रह जाता है। अभी किसी भी दल या प्रत्याशी पर कड़ी कार्रवाई नहीं हुई है। शायद यही वजह है कि उन्हें आचार संहिता का उल्लंघन करने का साहस मिलता रहा है। यह सर्वविदित हैकि लोकतंत्र में परम स्वतंत्र कोई नहीं होता। अफसोस है कि इस तरह अपनी मनमानी के चलते उम्मीदवार लोकतंत्र की बुनियादी मान्यता को ही चोट पहुंचा रहे हैं।
चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद चुनाव आयोग को कई अहम फैसले लेने के अधिकार मिल जाते हैं। वह शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराने के लिए प्रशासन तंत्र में अपने तरीके से फेरबदल भी करता है। वह आचार संहिता के उल्लंघन के चलते उम्मीदवारों की उम्मीदवारी पर भी प्रश्न चिह्न् लगा सकता है। चुनाव आयोग को ये अधिकार धीरे-धीरे ही प्राप्त हुए हैं। आयोग ने बाहुबल और धनबल पर रोक लगाने में बहुत हद तक सफलता पाई है, परंतु गैर-वाजिब टिप्पणी पर रोक लगाना उसके लिए अभी भी एक चुनौती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर आज अनुचित और अर्मयादित टिप्पणी के रूप में आचार संहिता के उल्लंघन का जो मामला चल रहा है, वह खतरनाक है। इस तरह की प्रवृत्ति पर समय रहते रोक नहीं लगाई गई तो चुनाव आयोग की प्रासंगिकता पर भी सवाल खड़े होने लगेंगे।
खबरों की अपडेट पाने के लिए लाइक करें हमारे इस फेसबुक पेज को फेसबुक हरिभूमि और हमें फॉलो करें ट्विटर पर-

और पढ़े: Haryana News | Chhattisgarh News | MP News | Aaj Ka Rashifal | Jokes | Haryana Video News | Haryana News App

Next Story
Top