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संवैधानिक मर्यादाओं के उल्लंघन की राजनीति

यह मामला यूपीए के शासनकाल में ही उजागर हुआ था। वहीं वर्धमान विस्फोट कांड को भी राजनीतिक रंग दे रही हैं।

संवैधानिक मर्यादाओं के उल्लंघन की राजनीति

ममता बनर्जी भारतीय राजनीति का वह तुनक मिजाज चेहरा हैं जो अपनी जिद्द और स्वार्थ की पूर्ति के लिए संवैधानिक मर्यादाओं का किसी भी स्तर पर जाकर उल्लंघन कर सकती हैं! ऐसी घटनाओं की सूची लंबी है, जब उन्होंने इस तरह के तेवर दिखाए हैं। मंगलवार को संसद के दोनों सदनों में उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने जिस तरह के गैरजिम्मेदाराना व्यवहार का परिचय दिया वह भी उसी कड़ी का हिस्सा है।

इससे पहले सोमवार को उन्होंने अपने हजारों कार्यकर्ताओं के साथ पश्चिम बंगाल में शारदा चिट फंड घोटाले की जांच कर रही सीबीआई के विरोध में प्रदर्शन किया। इस घोटाले में उनके कई सांसदों के नाम आए हैं, जिनको गिरफ्तार कर सीबीआई पूछताछ कर रही है। ममता का यह आरोप हास्यास्पद है कि सीबीआई का उपयोग कर केंद्र सरकार उन्हें बदनाम कर रही है जबकि सच्चाई यह है कि सीबीआई सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में यह जांच कर रही है।

यह मामला यूपीए के शासनकाल में ही उजागर हुआ था। वहीं वर्धमान विस्फोट कांड को भी राजनीतिक रंग दे रही हैं। वे भ्रम फैला रही हैं कि यह प्रायोजित है जबकि उन्हीं की पुलिस ने इसमें बांग्लादेशी आतंकवादियों का हाथ बताया है। गत लोकसभा चुनावों में वे चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ जिस तरह से अड़ गई थीं उससे देश में एक तरह से संवैधानिक संकट पैदा होने का खतरा बढ़ गया था। पूर्व रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी के खिलाफ उनका व्यवहार भला कौन भूल सकता है? अपनी ही पार्टी के नेता त्रिवेदी को अपमानित कर उन्होंने पद से हटवा दिया था। पूरे देश ने देखा कि किस तरह वे मनमोहन सिंह सरकार को ब्लैकमेल करती रहीं। माना जाता है कि वह इसी तरह छोटी बातों को मुद्दा बनाती हैं। इसके लिए वे पहले मुद्दों का चयन करती हैं। उससे जुडे बहाने तलाश करती हैं। फिर उसको चरम सीमा तक ले जाती हैं। और इस तरह वे उसका राजनीतिक लाभ लेने की भी कोशिश करती हैं, लेकिन ये जो राजनीतिक स्टंट है इसमें कभी-कभी देश की संवैधानिक संस्थाएं भी उनके निशाने पर आती हैं। जिनकी गरिमा, मर्यादा दांव पर लग जाती है। अब वैसा ही व्यवहार वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के साथ कर रही हैं। अपनी लड़ाई दिल्ली तक लाने की बेजा धमकी दे रही हैं।

दरअसल इसके पीछे उनकी बौखलाहट और भय है। वे अब भी स्वीकार नहीं पा रही हैं कि पश्चिम बंगाल में भाजपा का विस्तार हो रहा है। संसद को बाधित कर, मोदी सरकार पर आरोप लगाकर वे दबाव बनाने की राजनीति कर रही हैं। उनकी मंशा मोदी सरकार को ब्लैकमेल करने की प्रतीत होती है, लेकिन केंद्र सरकार ने भी साफ कर दिया है कि वह ऐसी ओछी राजनीति से बैकफूट पर नहीं आएगी। वह अपना काम करेगी और बेहतर होगा कि ममता बनर्जी भी कानून को अपना काम करने दें। वैसे भी कानून से ऊपर कोई नहीं है। इसमें कोई दो राय नहीं कि ममता बनर्जी एक ईमानदार नेता हैं। वे सादगी से जीवन जीती हैं।

किसानों, गरीबों और वंचित वर्गों की परवाह करती हैं, लेकिन इसके साथ-साथ उनका यह भी दायित्व बन जाता है कि वे संवैधानिक संस्थाओं व व्यवस्थाओं का सम्मान करें। ऐसी अराजक स्थिति पैदा न करें जिससे तमाम संस्थाएं लकवाग्रस्त हो जाएं।

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