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चिंतन: सरकारों और संगठन पर कांग्रेस की ढीली पकड़

अब उत्तराखंड में सीएम हरीश रावत की कांग्रेस सरकार के खिलाफ पार्टी के विधायकों ने खुली जंग छेड़ दी है।

चिंतन: सरकारों और संगठन पर कांग्रेस की ढीली पकड़
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अरुणाचल प्रदेश के बाद उत्तराखंड में कांग्रेस में खुली बगावत होने के बाद लग रहा है कि देश की सबसे पुरानी राष्ट्रीय पार्टी पर शीर्ष नेतृत्व की पकड़ बेहद ढीली हो गई है। 2014 के लोकसभा चुनाव के एक साल पहले से ही जनाधार खो रही कांग्रेस राज्यों से भी तेजी से गायब हो रही है। करीब-करीब सभी बड़े राज्यों से पार्टी की चुनावी रुखसती के बाद छोटे राज्यों की कांग्रेस सरकारों की स्थिति भी खराब होती जा रही है। पहले अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस विधायकों के एक गुट ने मुख्यमंत्री के खिलाफ बगावत कर दी, जिससे राज्य में संवैधानिक संकट पैदा हो गया। अब उत्तराखंड में सीएम हरीश रावत की कांग्रेस सरकार के खिलाफ पार्टी के विधायकों ने खुली जंग छेड़ दी है। हरक सिंह रावत, पूर्व सीएम विजय बहुगुणा समेत नौ कांग्रेसी विधायकों ने वित्त विधेयक के दौरान ही सीएम रावत के खिलाफ झंडा बुलंद कर दिया। नतीजा ये हुआ कि सरकार वित्त विधेयक पर चर्चा नहीं करा सकी। उसे सदन स्थगित करना पड़ा। इसके बाद हरीश रावत सरकार के सामने एकमात्र यही रास्ता बचा कि वह सदन में फिर से अपना बहुमत साबित करे। फिलहाल राज्यपाल केके पॉल ने सीएम हरीश रावत को बहुमत साबित करने के लिए 28 मार्च तक का समय दिया है। रावत ने भरोसा है कि वे बहुमत साबित कर देंगे। हालांकि रास्ता आसान नहीं है। खबर आ रही है कि बाकी बचे कांग्रेस विधायकों में एक और रावत विरोधी गुट उभर रहा है। आगे क्या होगा, इसका पता तो 28 को चलेगा, लेकिन कांग्रेस के लिए यह सोचने का समय है। लोकसभा चुनाव से पहले गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में भाजपा को परास्त नहीं कर सकी, राजस्थान में अपनी सरकार बचा नहीं सकी। लोकसभा चुनाव में 44 सीटों पर सिमट गई। उसके बाद हुए विधानसभा चुनावों में महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और जम्मू-कश्मीर में सत्ता से बाहर हो गई। इन राज्यों में भाजपा सत्ता में आई। दिल्ली में कांग्रेस का खाता नहीं खुला और वह केवल बिहार में लालू-नीतीश के कंधे पर सवार होकर कुछ सीटें पा सकी। अब पांच राज्यों में चुनावी बिगुल बज गया है, जिनमें से केरल व असम में कांग्रेस की सरकार है, यहां पार्टी की हालत खस्ता है और सत्ता में वापसी की उम्मीद क्षीण है। तमिलनाडु, पुडुच्चेरी और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की उम्मीदें ही नहीं हैं। ऐसे में देश में कांग्रेस जिस तरह सिमट रही है, उससे भाजपा के 'कांग्रेसमुक्त भारत' सपने धरातल पर उतरते दिख रहे हैं। इसका कारण भी है कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व जिस तरह तथ्यों से परे जाकर केवल और केवल पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ आरोपों की राजनीति कर रहे हैं, उसमें कांग्रेस के नेताओं का भरोसा अपनी पार्टी पर कम होता जा रहा है। कांग्रेस राज्यों में कपड़े की तरह मुख्यमंत्री बदलने के लिए कुख्यात रही है। उत्तराखंड में ही पहले विजय बहुगुणा को सीएम बनाया, फिर हरीश रावत को राज्य की कमान सौंपी। ऐसे में पार्टी में गुट बनना लाजिमी है। राज्यों में बगावत से लग रहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी पार्टी और संगठन पर अपनी पकड़ बना कर नहीं रख पा रहे हैं। इसलिए राहुल गांधी अगर आगे चलकर पार्टी की कमान संभालने का सपना देख रहे हैं, तो उन्हें सिर्फ मोदी के खिलाफ अपनी राजनीति को सीमित रखने के बजाय देशभर में कांग्रेस को मजबूत करने व पार्टी में अनुशासन पर ध्यान देना चाहिए। कहीं देर न हो जाए।

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