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कोल ब्लॉक आवंटन में पारदर्शिता की उम्मीद

कोयला भंडारों के मामले में देश दुनिया में पांचवें स्थान पर है। देश में ऊर्जा की बढ़ती खपत ने कोयले की मांग में बेतहाशा वृद्धि कर दी है

कोल ब्लॉक आवंटन में पारदर्शिता की उम्मीद
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नई दिल्ली. केंद्र सरकार उम्मीदों के अनुरूप आर्थिक सुधारों पर तेजी से फैसले ले रही है। सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट का कोयला खदानों को नए सिरे से आवंटन के लिए अध्यादेश लाने का फैसला काफी अहम है। क्योंकि देश में कोयले की किल्लत और बिजली संकट को देखते हुए इस तरह का कदम उठाना जरूरी हो गया था। बीते महीने अपने ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने 1993 के बाद से आवंटित 218 कोयला खदानों में से 214 कोयला खदानों के आवंटन को रद्द कर दिया था। देश के सामने कोई बड़ा संकट खड़ा न हो जाए इसे देखते हुए अदालत ने 46 ऐसे खदानों को, जिनमें खनन का काम चल रहा है, छह माह की छूट दी है।

छह महीने के अंदर केंद्र सरकार को रद्द हुए खदानों के आवंटन के लिए नई नीति बनानी जरूरी है। केंद्र सरकार ने इस चुनौती को कोल सेक्टर में सुधार के एक अवसर के रूप में स्वीकारा है। यही वजह है कि अध्यादेश के जरिए मोदी सरकार ने कोल ब्लॉक आवंटन के नियम बदलने को मंजूरी दी है। इन कोयला खदानों की सरकार नए सिरे से नीलामी करेगी। पहले चरण में केंद्र और राज्य सरकारों के उपक्रमों को अलग से खदानें आवंटित होंगी। फिर बचे खदानों का एक समूह बनेगा और स्टील, बिजली, सीमेंट कंपनियों के बीच ई-ऑक्शन से वे नीलाम होंगे। साथ ही, भविष्य में वाणिज्यिक जरूरतों के लिए भी कोयला खदान नीलाम किए जाने की संभावना है। इस कदम को कोयला खदानों पर सरकारी कंपनियों के एकाधिकार खत्म होने के तौर पर भी देखा जा रहा है।

पहले चरण में लगभग 74 कोयला खदानों की नीलामी होगी। इस प्रक्रिया से प्राप्त समूचा राजस्व राज्य सरकारों को दिया जाएगा। केंद्र सरकार के इस फैसले से ओडिशा, पश्चिम बंगाल, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों की वित्तीय स्थिति सुधरेगी। क्योंकि इन्हीं राज्यों में देश की ज्यादातर कोयला खदानें हैं। इन राज्यों में जहां ये खदाने हैं, वहां आम तौर पर आदिवासी रहते हैं। राज्य आर्थिक रूप से मजबूत होंगे तो गरीबों के लिए नई योजना भी चला सकेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राज्यों को ज्यादा आर्थिक आजादी देने के पक्षधर रहे हैं। पूर्व में वे इस बात को उठाते रहे हैं।

यह नीलामी पूरी तरह से पारदर्शी तरीके व इंटरनेट के जरिये होगी। साथ ही इसकी पूरी प्रक्रिया तीन से चार महीने में पूरी हो जाएगी। लिहाजा भ्रष्टाचार और बंदरबांट की गुंजाइश नहीं रह जाएगी। पूर्व यूपीए सरकार की नीतियों और खानों के विकास में देरी से देश में कोयले की मांग व आपूर्ति में भारी अंतर पैदा हो गया है। आज कोयले की इस कमी को महंगे आयात के जरिए पूरा किया जा रहा है। इस वजह से ही भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कोयला आयातक बन गया है।

कोयला भंडारों के मामले में देश दुनिया में पांचवें स्थान पर है। आज देश में ऊर्जा की बढ़ती खपत ने कोयले की मांग में बेतहाशा वृद्धि कर दी है। इस मांग को अकेले कोल इंडिया पूरा नहीं कर सकती है। निजी कंपनियों की इसमें भागीदारी जरूरी है। उम्मीद की जानी चाहिए इस नीतिगत बदलावों को बाजार सकारात्मक रूप में लेगा और आने वाले दिनों में देश में कोयले का खनन बढ़ेगा।

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