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इस्लामी समझ की बानगी, पेरिस हमले की दुनियाभर में हुई अलोचना

पेरिस के आतंकी हमले की दुनियाभर में एक स्वर में भर्त्सना की जा रही है।

इस्लामी समझ की बानगी, पेरिस हमले की दुनियाभर में हुई अलोचना
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किसी शायर ने सही ही कहा है कि ‘अपना चेहरा न देखा गया, आईने से खफा हो गए’...। यह बात पेरिस में एक वीकली अखबार के दफ्तर पर इस्लामी आतंकियों के हमला करने वालों को 51 करोड़ रुपये का इनाम देने का ऐलान करने वाले यूपी के पूर्व मंत्री एवं बसपा नेता हाजी याकूब की इस्लामी समझ की बानगी के लिए सटीक बैठती है, जो इससे पहले डेनमार्क के कार्टूनिस्ट के सिर पर 51 करोड़ रुपये का इनाम घोषित कर चर्चा में आए थे। जबकि पेरिस के आतंकी हमले की दुनियाभर में एक स्वर में भर्त्सना की जा रही है। खासतौर पर इस्लाम को लेकर इसमें छपने वाली सामग्री की प्रतिक्रिया स्वरूप।

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खैर इस्लाम के नाम पर हिंसा की यह कोई पहली वारदात नहीं है। इराक, सीरिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान से लेकर दुनिया भर में इस्लाम और जेहाद के नाम पर खूनखराबा जारी है। आलिम भी नहीं समझ पा रहे कि यह कौन सा इस्लाम है? तमाम मुस्लिम दीनी आलिम कह रहे हैं कि ऐसा करने वाले दीन-ए-इस्लाम को नहीं समझते। इस्लामी समझ की बानगी पेश करने वाले इन नेताजी के बारे में चर्चा है कि इससे पहले की गई घोषणा की रकम अदा कर दी है? पेरिस के हमलावर तो मारे जा चुके हैं फिर इस घोषणा की रकम किसे देंगे नेताजी। कुछ भी हो सुर्खियों में आए नेताजी सोशल मीडिया पर छा गये हैं, जहां नेताजी पर ऐसे भी कटाक्ष किए गए हैं कि भारत में भी अजीब-अजीब नमूने है, खैर खबर है कि बोको हराम के उग्रवादियों ने नाइजीरिया के शहर बागा में 100 से ज्यादा लोगों की हत्या कर दी, तो लगे रहो मुन्नाभाइयों ,पता नहीं कौन सा बंैक लैश है, हाजी जी 51 करोड़ किसे दोगे ,मारने वालों को या मृतकों के परिजनों को, आप इनाम बांटो और लोग अपनी संवेदना व श्रद्धासुमन अर्पित करते रहेंगे।

खरी भी सुनो जनाब!
इस आधुनिक युग में लोकतंत्र की अभिव्यक्ति में सोशल मीडिया पर खरी-खरी बात लिखकर पोस्ट करने वालों की कमी नहीं है, लेकिन उसके मुकाबले यदि कोई खरी बात करे तो उसके लिये शिकवा शिकायत करने की आदत भी कुछ स्वंभू बुद्धिजीवी करने में पीछे नहीं हैं। सोशल मीडिया पर इसी बात को लेकर चलने वाली बहस में यह चर्चा स्वाभाविक है कि खरी बात करते हो तो खरी टिप्पणियों को सहन करना भी आना चाहिए।
मसलन बुद्धि के सहारे जीवकोपार्जन करने वाले, खासतौर पर मीडिया महारथी, थोड़ी प्रसिद्धि पाकर लोकतृष्णा का इस कदर शिकार होते हैं कि उनके पूरे व्यक्तित्व पर तानाशाही हावी हो जाती है। खुद का लिखा ब्रह्म वाक्य मान कर अनुकूल टिप्पणी की ही अपेक्षा रखते हैं। खासकर तब जब आप उनकी पोस्ट पर प्रतिकूल टिप्पणी कर दें। आप गौर कीजिए कि ऐसे महारथी आए दिन शिकवा-शिकायत करते मिल जाएंगे। खरी लिखना जानते हैं, पर खरी सुनना उनकी आदत में शुमार नहीं?
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