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संवेदनशील मामलों पर कब बंद होगी सियासत

ऐसे मामलों के लिए सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव का वह बयान भी बहुत हद तक जिम्मेदार हो सकता है।

संवेदनशील मामलों पर कब बंद होगी सियासत
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उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में दिल दहला देने वाली वारदात के बाद शुरू हुए सियासी दौरे यह दर्शा रहे हैं कि कुछ पार्टियां इस मुद्दे को अपने अपने ढंग से अपने खोए हुए जनाधार को पाने के लिए इस्तेमाल कर रही हैं। दो दलित बहनों के साथ गैंगरेप और उसके बाद उन्हें मारकर पेड़ पर लटका देने का मामला बहुत ही संवेदनशील है, लेकिन जिस तरह से इसे राजनीति के चश्मे से देखा जा रह है, वह दिखाता है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों किस हद तक उत्तर प्रदेश की जनता से कट गए हैं।
इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों की ओर से जिस तरह की संवेदनशीलता और गंभीरता दिखाई जानी चाहिए था, उसकी कमी साफ तौर पर महसूस की जा रही है। इस घटना को संयुक्त राष्ट्र ने भी भयानक अपराध करार दिया है। यह आरोप लगते रहे हैं उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था लचर हो गई है और प्रशासन कुछ लोगों के इशारों पर ही चलता है। लिहाजा, उत्तर प्रदेश ऐसा राज्य बन गया है जहां हत्या और बलात्कार के ग्राफ तेजी से बढ़ रहे हैं। यह बहदाली इस मामले में भी दिखी जब यह बात सामने आई कि इसमें कुछ पुलिसकर्मी भी शामिल हैं।
इसी तरह की एक दर्दनाक घटना दो वर्ष पूर्व दिल्ली में दामिनी के सामूहिक बलात्कार के रूप में सामने आई थी। पूरा देश उसकी बर्बरता से दहल गयाथा। केंद्र सरकार भी हरकत में आई और महिलाओं के खिलाफ आपराधिक कानून में कई अहम बदलाव किए गए। उम्मीद थी कि उससे समाज में एक खौफ पैदा होगा पर इस घटना के बाद लगता है कि समाज को अभी भी लंबा रास्ता तय करना है परंतु इसके लिए कानून का राज कायम करने वाली संस्था को मुस्तैदी दिखानी होगी। यदि पुलिस ही इसमें शामिल होगी तो ऐसी घटनाएं नहीं रुकेंगी।
जाहिर है उत्तर प्रदेश में ऐसे मामलों के लिए सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव का वह बयान भी बहुत हद तक जिम्मेदार हो सकता है जिसमें उन्होंने बलात्कारियों को फांसी न देने की वकालत की थी और बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को महज लड़कों की एक भूल करार दिया था। समझना होगा कि मुआवजा देने भर से ऐसे मामले खत्म नहीं हो जाते, पीड़ित परिवार को न्याय मिलना चाहिए। जिन लोगों ने यह अपराध किया है उन्हें सबक मिलना चाहिए कि देश में यह नहीं चल सकता। यहां कानून का राज है, जो सबके लिए समान है। वहीं जिस तरह से राजनीति हो रही है, वह ठीक नहीं है।
शनिवार को कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी पीड़ित परिवार से मिलने गए थे। फिर रविवार को पार्टी की ओर से लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को भेजा गया। रविवार को ही बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती तामझाम के साथ वहां गईं और पार्टी की ओर से पांच-पांच लाख रुपये की मदद देने का ऐलान किया। मायावती की यह अतिसक्रियता समझी जा सकती है। 16वीं लोकसभा चुनावों में उनको उत्तर प्रदेश के 80 लोकसभा सीटों में से एक भी सीट नहीं मिली है। एक तरह से उनका खाता भी नहीं खुला। कहा जा रहा है कि ऐसी संवेदनशील घटनाओं की आड़ में वे पार्टी का खोया हुआ जनाधार वापस लाने के लिए सियासत कर रही हैं। कुछ ऐसी ही कांग्रेस की ओर से भी होती दिख रही है। ऐसे मुद्दों पर सियासत नहीं होनी चाहिए।
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