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अवधेश कुमार का लेख : चीन को झटका देना ही होगा

चीन के आर्थिक बहिष्कार की शुरुआत हो गई है जो आने वाले समय में तेजी से परवान चढ़ेगी। बहरहाल, कौन भारतीय नहीं चाहेगा कि अपने दुश्मन देश का सामान हम न खरीदें, उसे आर्थिक रूप से धक्का दें तथा उसकी जगह स्वदेशी या मित्र देशों के उत्पाद का इस्तेमाल करें, लेकिन जिस सीमा तक हम चीन पर निर्भर हो चुके हैं उसमें उसका पूर्ण बहिष्कार एकाएक संभव नहीं है, इसलिए जरूरी है कि एक-एक करके कदम उठाएं।

अवधेश कुमार का लेख : चीन को झटका देना ही होगा
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अवधेश कुमार

देश में इस बात पर एकराय है कि चीन को आर्थिक रुप से आघात पहुंचाने के जितने कदम संभव हो उठाए जाएं। आम जनता से लेकर व्यापारियों के संगठन तक इसके पक्ष में प्रदर्शन कर चुके हैं। सरकार के स्तर पर कुछ ऐसे कदम उठाए गए हैं जिनसे लगता है कि देश चीन के आर्थिक बहिष्कार की ओर बढ़ रहा है। वाणिज्य व उद्योग मंत्रालय ने पिछले एक महीने में कई वस्तुओं के आयात शुल्क में बढ़ोतरी की है ताकि घरेलू स्तर पर ही इसके निर्माण को प्रोत्साहित किया जा सके। इस दिशा में सबसे बड़ा कदम चीन के 59 एप्प को प्रतिबंधित करना है। भारतीय ऐप बाजार में 40 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ चीनी ऐप का रहा है। रेलवे उपक्रम डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कारपोरेशन लिमिटेड ने चीनी फर्म बीजिंग नेशनल रेलवे रिसर्च एंड डिज़ाइन इंस्टीट्यूट ऑफ सिग्नल एंड कम्युनिकेशन कंपनी लिमिटेड के साथ चल रहे कॉन्ट्रेक्ट को रद्द कर दिया है। दूरसंचार विभाग ने भी यह फैसला किया है कि बीएसएनएल एवं एमटीएनएल के 4 जी इक्विपमेंट को अपग्रेड करने के लिए चीनी सामान का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। इसे 5जी संबंधी उपकरणों के निविदा से हुआवेई के नेतृत्व में वेंडरों को निविदा से बाहर करने के रुप में देखा जा रहा है। इसी बीच दिल्ली मेरठ आरआरटीएस की टनल के ठेके पर पुनर्विचार का संकेत आ चुका है।

इस तरह लगता है कि चीन के आर्थिक बहिष्कार की शुरुआत हो गई है जो आने वाले समय में तेजी से परवान चढ़ेगी। बहरहाल, कौन भारतीय नहीं चाहेगा कि अपने दुश्मन देश का सामान हम न खरीदें, उसे आर्थिक रुप से धक्का दें तथा उसकी जगह स्वदेशी या मित्र देशों के उत्पाद का इस्तेमाल करें? लेकिन यह इतना आसान नहीं हैं जितना भावनाओं के उद्वेग में बहुत सारे लोग समझ रहे हैं। व्यापारियों के अखिल भारतीय संगठन द कंफेडरेशन ऑफ आल इंडिया ट्रेडर्स ने कहा है चीनी उत्पादों के विकल्प के रूप में स्थानीय भारतीय उत्पादों का उपयोग असंभव भले न हो नहीं, लेकिन कठिन जरूर है। वस्तुतः चीन के आयात को पूरी तरह रोकना इस समय संभव नहीं है। अपने कुल आयात का 14 प्रतिशत से ज्यादा हम चीन से करते हैं। वर्ष 2019-20 में हमने चीन को 1,79,766.72 करोड़ का निर्यात किया तो 550,786.66 करोड़ का आया। इतना व्यापारिक घाटा हम क्यों सहन करें? इतना लाभ दुश्मन देश को क्यों लेने दें? स्टेट बैक्ड इन्वेस्ट इंडिया डेटा के अनुसार चीनी उत्पादों के निर्यात के लिए भारत सातवां बड़ा स्थान है। तो चीन से निपटने के लिए जरुरी है कि सैन्य, कूटनीति के साथ आर्थिक मोर्चे पर उसे धक्का दिया जाए।

लेकिन जिस सीमा तक हम चीन पर निर्भर हो चुके हैं उसमें उसका पूर्ण बहिष्कार एकाएक संभव नहीं है। जरूरी दवाइयों के लिए 65 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा माल यानी एपीआई चीन से आता है। दूरसंचार, सौर उर्जा, इलेक्ट्रिक रिक्शा और स्टोरेज बैट्रीज में वह विश्व का बादशाह है। हम सौर उर्जा के वैश्विक संगठन के जनक हैं। अपने यहां इसको प्रोत्साहित कर रहे हैं लेकिन उसके 90 प्रतिशत उपकरण और सामग्रियां चीन से आ रहीं हैं। हमारी गाड़ियों में लगने वाले 27 प्रतिशत पार्ट चीन से आते हैं। 45 प्रतिशत इलेक्ट्रॉनिक सामान टीवी, रेफ्रिजरेटर, वॉशिंग मशीन और एसी बनाने में उपयोग होने वाले 70 प्रतिशत कंपोनेंट भी चीन से ही आते हैं। यही नहीं भारी मात्रा में सिंथेटिक धागा, सिंथेटिक कपड़ा, बटन, जिपर, हैंगर और निडिल भी हम चीन से खरीदते हैं। 2020 की पहली तिमाही यानी जनवरी से मार्च के बीच भारतीय स्मार्टफोन बाजार में चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से भी ज्यादा है। देश के भारत में स्मार्टफोन बनाने वाली पहली पांच कंपनियों में चार शाओमी, वीवो, ओप्पो, रियलमी चीनी कंपनियां हैं। टॉप-5 में सिर्फ सैमसंग ही है, जो दक्षिण कोरियाई कंपनी है। यूनिकॉर्न क्लब में शामिल भारत के 30 में से 18 स्टार्टअप में चीन का पैसा लगा है। यूनिकॉर्न क्लब में उन्हें शामिल किया जाता है, जिसकी नेटवर्थ 1 अरब डॉलर से ज्यादा होती है। चीन की सबसे बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा, टिकटॉक बनाने वाली बाइटडांस और टेक कंपनी टेन्सेंट ही भारत के 92 स्टार्टअप को फंडिंग करती हैं। इनमें पेटीएम, फ्लिपकार्ट, बायजू, ओला और ओयो जैसे स्टार्टअप शामिल हैं। चीन की अलीबाबा कंपनी ने भारत की ई-कामर्स कंपनी स्नैपडील, डिजिटल वैलेट कंपनी पेटीएम तो फूड डिलीवरी कंपनी जोमैटो में टेनसेंट ने मैसेजिंग कंपनी हाइक और कैब एग्रीगेटर ओला एप में निवेश किया है।

कहने का तात्पर्य यह कि चीन पर हमारी निर्भरता काफी है। हम विश्व व्यापार संगठन के नियमों का उल्लंघन करते हुए भी एकाएक उसके आयात पर रोक लगाते हैं तो खामियाजा किसे भुगतना होगा? चीन से सस्ते दाम पर कच्चे माल मिल जाते हैं। इससे लागत कम रहती है। फार्मा एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के चेयरमैन दिनेश दुआ ने कहा कि एपीआइ का आयात चीन से रोकने या खत्म करने पर घरेलू दवा महंगी हो जाएगी। हमने आर्थिक संकट का लाभ उठाकर चीनी कंपनियों द्वारा भारतीय कंपनियों या भारत में सक्रिय विदेशी कंपनियों का शेयर खरीदकर उस पर नियंत्रण करने की नीति पर रोक लगाने के लिए उसे ऑटोमेटिक रुट की बजाय सरकारी अनुमति के दायरे में ला चुके हैं। किंतु आज पेटीएम का उपयोग कितने भारतीय करते हैं? ओला का उपयोग कितना बढ़ा है? इनमें कितने लोगों को रोजगार मिला हुआ है? इन स्टार्टअप के लिए जब तक निवेश की व्यवस्था नहीं होती तब तक कैसे उसकी गतिविधियों को रोका जा सकता है? हालांकि कच्चे माल की बात तो समझ में आती है, किंतु मोटर पार्ट से लेकर उपभोग सामग्रियों के बारे में देश संकल्प कर ले तो विकल्प मिल सकता है। जो ऐप्प अपरिहार्य लगते थे अब उनके बिना हमारा काम चलेगा। हर भारतीय को संकल्प शक्ति से काम करना होगा। जिस तरह कारोबारी वर्ग इस मामले में भी सरकार का मुंह ताक रहा है वह अनुचित है।

इस मानसिकता से हम चीन जैसे देश से नहीं जीत सकते। निर्माताओं और निर्यातकों को अपने स्तर पर आगे आन होगा। वे क्यों नहीं समझते कि यह देसी कंपनियों के लिए अवसर के रुप में है? आम जन में स्वदेशी की भावना फैली है। लोग ज्यादा मूल्य देकर भी देश का निर्मित सामान खरीदने को आज मानसिक रुप से तैयार हैं। यह हमारी कंपनियों के लिए अच्छा अवसर है जो भारत के साथ मधुर संबंध रखते हैं किंतु चीन की प्रतिस्पर्धा में नहीं टिक पा रहे थे। कोरोना वायरस में चीन की संदिग्ध भूमिका के कारण जो कंपनियां वहां से निकलना चाहतीं हैं वे भारत आएं, उनको सरकार मदद करने के लिए तैयार है। भारत सरकार तकनीक और इलेक्ट्रोनिक सामग्रियों के लिए ताईवान, दक्षिण कोरिया, जापान, वियतनाम आदि के साथ मिलकर काम करे तो चीन का विकल्प मिल जाएगा।

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