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प्रमोद भार्गव का लेख : चीन के खून में है धोखेबाजी

धोखेबाजी चीन की प्रकृति में है। 1962 में उसने भारत पर अचानक हमला बोलकर पूर्वोत्तर इलाके की 40 हजार वर्ग किलोमीटर जमीन हड़प ली थी। यही वह भू-भाग है, जिसमें कैलाश मानसरोवर स्थित है। यह स्थल भगवान शिव के आराध्य स्थलों में से एक है। इसका धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और भौगोलिक महत्व हमारे प्राचीन संस्कृत ग्रंथो में दर्ज है। इन ग्रंथों में कैलाश मानसरोवर को अखंड भारत का हिस्सा बताया गया है, लेकिन भोले भंडारी अब चीन के कब्जे में हैं।

भारत-चीन सीमा विवाद : चीन के खिलाफ भारत ने बनाई नई रणनीति, सैनिकों को दिए जाएंगे ये हथियार
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प्रमोद भार्गव

भारत और चीन की परस्पर मेल खाती हुई सभ्यता पांच हजार साल से भी ज्यादा पुरानी है। करीब ढाई हजार साल से भारत-चीन के सांस्कृतिक संबंध बने हुए हैं। भारत ने संस्कृति के स्तर पर चीन को हमेशा नई सीख दी है। करीब दो हजार साल पहले बौद्ध धर्म भारत से ही चीन गया था। इसके पहले वहां कनफ्युशिश धर्म था। दोनों को मिलाकर नवकनफ्यूशनवाद बना। जिसे चीन ने स्वीकार किया। संस्कृति के इसी मेल-मिलाप के बूते चीन ने हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा सृजित कर भाई-चारे का राग अलापा, लेकिन 1962 में युद्ध छेड़कर भारत की पीठ में छुरा घोंपने का काम भी किया। तब से चीन की कटुता निरंतर बनी हुई है। चीन की बढ़ती सामरिक ताकत के साथ उसकी महत्वकांक्षा भी बेलगाम हुई है। इसी कारण चीन जब चाहे तब दोगली कूटनीति पर उतर आता है। संस्कृति के क्षेत्र में तो चीन का यह दोगलापन हर जगह दिखाई देता है।

जाहिर है पंचशील सिद्धांतों का आदर उसकी कार्यशैली में नहीं है। इसीलिए भारत ही नहीं चीन के ज्यादातर पड़ोसी देशों से मधुर संबंध नहीं है। चीन-सीमा से 14 देश जुड़ते हैं। दरअसल डोकलाम के बाद चीन को गालवन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तेतृत्व में जबरदस्त चुनौती मिल रही है। इसीलिए चीन क मुख्य पत्र ग्लोबल टाइम्स में धमकी दी गई है कि कोरोना से क्षतिग्रस्त अर्थव्यवस्था से कमजोर हुए भारत को अमेरिका के इशारों पर चीन से युद्ध मंहगा पड़ेगा। दरअसल चीन अब तक धोखाधड़ी करके भारत समेत अन्य देशों की सरजमीं में घुसपैठ कर हड़प नीति को अंजाम देता रहा है। किंतु अब उसकी इन कुटिल मंशाओं के मुकाबले में भारत खड़ा हो गया है।

1962 में चीन ने भारत पर अचानक हमला बोलकर पूर्वोत्तर इलाके की 40 हजार वर्ग किलोमीटर जमीन हड़प ली थी। यही वह भू-भाग है,जिसमें कैलाश मानसरोवर स्थित है। यह स्थल भगवान शिव के आराध्य स्थलों में से एक है। इसका धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और भौगोलिक महत्व हमारे प्राचीन संस्कृत ग्रंथो में दर्ज है। इन ग्रंथों में कैलाश मानसरोवर को अखंड भारत का हिस्सा बताया गया है। लेकिन भोले भंडारी अब चीन के कब्जे में हैं। चीन ने इतनी छूट जरूर दी हुई है कि वह वर्ष में एक बार भारतीय श्रद्वालुओं को भोले शंकर के दर्शन का अवसर दे देता है। वह भी अपनी शर्तों और चीनी सेना की देखरेख में। हिमालय क्षेत्र में सीमा विवाद निपटाने के लिए 1914 में भारत-तिब्बत शिमला सम्मेलन बुलाया गया था। इसमें मैकमोहन रेखा से भारत-तिब्बत के बीच सीमा का बंटवारा किया गया था। चीन इसे गैरकानूनी औपनिवेशिक और पारंपरिक मानता है, जबकि भारत इस रेखा को अंतरराट्रीय सीमा का दर्जा देता है। 3488 किमी लंबी यही रेखा जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणचल और भूटान तक विवाद की जड़ बनी हुई है।

चीन की दोगलाई कूटनीति तमाम राजनीतिक मुद्दों पर साफ दिखाई देती है। चीन बार-बार जो आक्रामकता दिखा रहा है, इसकी पृष्ठभूमि में उसकी बढ़ती ताकत और बेलगाम महत्वाकांक्षा है। यह भारत के लिए ही नहीं दुनिया के लिए चिंता का कारण बनी हुई है। दुनिया जनती है कि भारत-चीन की सीमा विवादित है। सीमा विवाद सुलझाने में चीन की कोई रुचि नहीं हैं। वह केवल घुसपैठ करके अपनी सीमाओं के विस्तार की मंशा पाले हुए है। चीन भारत से इसलिए नाराज है, क्योंकि उसने जब तिब्बत पर कब्जा किया था, तब भारत ने तिब्बत के धर्मगुरू दलाई लामा के नेतुत्व में तिब्बतियों को भारत में शरण दी थी। जबकि चीन की इच्छा है कि भारत दलाई लामा और तिब्बतियों द्वारा तिब्बत की आजादी के लिए लड़ी जा रही लड़ाई की खिलाफत करे।

2016 में भारत का चीन से डोकलम क्षेत्र में सामरिक सड़क के निर्माण को लेकर विवाद हुआ था। डोकलम क्षेत्र को चीन ने चीनी नाम डोगलांग दिया है, जिससे यह क्षेत्र उसकी विरासत का हिस्सा लगे। इस क्षेत्र को लेकर चीन और भूटान के बीच कई दशकों से विवाद जारी है। चीन इस पर अपना मालिकाना हक जताता है, जबकि वास्तव में यह भूटान के स्वामित्व का क्षेत्र है। चीन अरुणाचल की तरह सड़क के बहाने इस क्षेत्र में स्थाई घुसपैठ की कोशिश में है। जबकि भूटान इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानता है।

अर्से से इन्हीं कूटिल कूटनीतिक चालों के चलते कम्युनिष्ट विचारधारा के पोषक चीन ने माओवादी नेपालियों को अपनी गिरफ्त में लिया और नेपाल के हिंदू राष्ट्र होने के संवैधानिक प्रावधान को खत्म करके प्रचंड को प्रधानमंत्री बनवा दिया था। चीन नेपाल की पाठशालाओं में चीनी अध्यापकों से चीनी भाषा मंदारिन भी मुफ्त में सिखाने का काम कर रहा है। माओवादी प्रभाव ने ही भारत और नेपाल के प्राचीन रिश्ते में हिंदुत्व और हिंदी की जो भावनात्मक तासीर थी, उसका गाढ़ापन ढीला किया।

भारत के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारतीय राजनीतिक नेतृत्व ने कभी भी चीन के लोकतंात्रिक मुखौटे में छीपि साम्राज्यवादी मंशा को नहीं समझा। यही वजह रही कि हम चीन की हड़प नीतियों व मंसूबों के विरुद्ध दृढ़ता से खड़े नहीं हो पाए ? अलबत्ता हमारे तीन प्रधानमंत्रियों, जवाहर लाल नेहरू, राजीव गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी ने तिब्बत को चीन का अविभाजित हिस्सा मानने की उदारता ही जताई। इसी खूली छूट के चलते ही बड़ी संख्या में तिब्बत में चीनी सैनिकों की घुसपैठ शुरू हुर्ह। अब तो चीन तिब्बती मानव नस्ल को ही बदलने में लगा है। ताइवान का यही हश्र चीन कर चुका है। चीन ने दखल देकर पहले इसकी सांस्कृतिक अस्मिता को नष्ट-भ्रष्ट किया और फिर ताइवान का बाकायदा अधिपति बन बैठा।

चीन भारत को हर जगह मात देने की फिराक में रहता है। पाकिस्तान ने 1963 में पाक अधिकृत कश्मीर का 5180 वर्ग किमी क्षेत्र चीन को भेंट कर दिया। तब से चीन पाक का मददगार हो गया। चीन की पीओके में शुरू हुई गतिविधियां सामाजिक दृष्टि से चीन के लिए हितकारी हैं। यहां से वह अरब सागर पहुंचने की जुगाड़ में जुट गया है। इसी क्षेत्र में चीन ने सीधे इस्लामाबाद पहंुचने के लिए काराकोरम सड़क मार्ग भी तैयार कर लिया है। इस दखल के बाद चीन ने पीओके क्षेत्र को पाकिस्तान का हिस्सा भी मानना शुरू कर दिया। चीन ने समुद्र तल से 3750 मीटर की उंचाई पर बर्फ से ढके गैलोंग्ला पर्वत पर 33 किमी लंबी सुरंग बनाकर इस बाधा को दूर कर दिया है। यह सड़क सामारिक नजरिए से बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि तिब्बत में मोशुओ काउंटी भारत के अरुणाचल का अंतिम छोर है। ये सभी कार्य चीन ने समझौतों के साथ छल करके किए हैं। अपने हितों के लिए चीन समझौतों की इबारत की परिभाषा अपने ढंग से गढ़ लेता है। चीन की बहरुपिए मुखौटे में छिपी धोखेबाजी की चालों से फलीभूत हो रही हैं।

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