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संपादकीय लेख : भाजपा ने नए चेहरे पर दांव से फिर चौंकाया

भूपेंद्र पटेल को गुजरात के नए मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी दी गई है। पार्टी ने इससे पहले यह प्रयोग हरियाणा में किया था। हमेशा चौंकाने की अपनी प्रवृत्ति को पार्टी ने इस बार भी बरकरार रखा है। गुजरात में मुख्यमंत्री परिवर्तन को भाजपा की सबसे बड़ी चुनावी तैयारी माना जा सकता है। विधानसभा चुनाव से करीब 15 महीने पहले पार्टी ने गुजरात में सीएम का चेहरा बदल दिया है। जिस तरह विजय रुपाणी के अचानक इस्तीफे ने चौंकाया, ठीक उसी तरह भूपेंद्र भाई रजनीकांत पटेल को गुजरात की कमान का सौंपा जाना किसी आश्चर्य से कम नहीं है।

संपादकीय लेख : भाजपा ने नए चेहरे पर दांव से फिर चौंकाया
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संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial : नए चेहरे पर दांव लगाकर भाजपा ने एक बार फिर साबित किया है कि वह पार्टी विद डिफरेंस है। भाजपा ने फिर पहली बार विधायक बने किसी नेता को सीधे सीएम बनाया है। भूपेंद्र पटेल को गुजरात के नए मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी दी गई है। पार्टी ने इससे पहले यह प्रयोग हरियाणा में किया था। हमेशा चौंकाने की अपनी प्रवृत्ति को पार्टी ने इस बार भी बरकरार रखा है। गुजरात में मुख्यमंत्री परिवर्तन को भाजपा की सबसे बड़ी चुनावी तैयारी माना जा सकता है। विधानसभा चुनाव से करीब 15 महीने पहले पार्टी ने गुजरात में सीएम का चेहरा बदल दिया है। जिस तरह विजय रुपाणी के अचानक इस्तीफे ने चौंकाया, ठीक उसी तरह भूपेंद्र भाई रजनीकांत पटेल को गुजरात की कमान का सौंपा जाना किसी आश्चर्य से कम नहीं है। रुपाणी के त्यागपत्र के बाद जिन-जिन नामों की चर्चा थी, उनमें दूर दूर तक भूपेंद्र पटेल का नाम नहीं था।

पाटीदार समाज में मजबूत पकड़ रखने वाले भूपेंद्र पटेल पर गुजरात में भाजपा की वापसी कराने की महती जिम्मेदारी होगी। एंटी इन्कंबेंसी की आशंका, कोविड प्रबंधन में कोताही आदि के चलते विजय रुपाणी की विदाई दी गई। हाल में पिछले छह माह में भाजपा ने पांच मुख्यमंत्री बदले हैं। असम में सर्बानंद सोनोवाल के बदले हेमंत बिस्वा सरमा को मुख्यमंत्री बनाया। कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा हटाकर लिंगायतत समुदाय से ही बसवराज बोम्मई तो उत्तराखंड में त्रिवेंद्र रावत के बाद तीरथ सिंह रावत को भी हटाकर पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बनाया गया। अगले साल उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात समेत छह राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। भाजपा अपनी तैयारी में कोई कोर नहीं छोड़ना चाहती है। उत्तर प्रदेश और गुजरात में पार्टी की साख दांव पर है। गुजरात में 2017 के विस चुनाव में भाजपा की सीटें कम हो गई थी। 182 सीटों वाली विधानसभा में 99 सीटों से संतोष करना पड़ा था। सरकार तो बन गई थी, पर पार्टी को दस्तक भी मिल गई कि आगे की राह आसान नहीं है। 2022 में स्थिति बदली होगी। पहले भाजपा के सामने के वल कांग्रेस की चुनौती थी, पर अब आम आदमी पार्टी ने भी गुजरात में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। निकाय चुनाव में आप को सीटें मिलीं।

विधानसभा के उपचुनाव में छह में से तीन पर कांग्रेस को विजय मिली है। ऐसे में संकेत साफ है कि भाजपा की ओर से जरा भी ढिलाई चुनाव परिणाम पर भारी पड़ सकती है। इस बार के विस चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी भी मैदान में होगी। ऐसे में भाजपा चाहती है कि गुजरात की तैयारी में कोई कमी नहीं रहे। गुजरात इसलिए भी अहम है कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व गृहमंत्री अमित शाह का गृह राज्य है। ऐसे में गुजरात से मिलने वाले हर संदेश समूचे देश की राजनीति को प्रभावित करेंगे। गुजरात के 17वें सीएम भूपेंद्र पटेल के कंधे पर सारा दारोमदार होगा, उन्हें सबको साथ लेकर चलना होगा। उनके साथ अनुभवी नेताओं की फौज है, मोदी और शाह का सहयोग है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का वरदहस्त है और उनकी अपनी सांगठनिक क्षमता है। पाटीदार समाज में अच्छी पैठ के साथ-साथ उन्हें गुजरात के सभी वर्गों का दिल जीतना होगा। हालांकि उनके पास सीएम के तौर पर समय कम है, लेकिन उन पर 'जीत' का परिणाम देने का महती भार होगा। भूपेंद्र पटेल की सफलता विचारधारा व प्रतिबद्धता की राजनीति को फिर से स्थापित करेगी।

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