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संपादकीय : नक्सलियों के खिलाफ निर्णायक एक्शन हो

खुफिया तंत्र की कार्यप्रणाली में भी बदलाव की जरूरत है। क्या हमारे उच्च अधिकारियों को यह नहीं पता कि एक ही इलाके में बड़े अधिकारियों की मौजूदगी नक्सलियों को भी अलर्ट कर देती है। उन्हें बड़े अधिकारियों के लगातार मूवमेंट की भनक लग जाती है, जिसके अनुसार वो अपनी प्लानिंग करते हैं। बीजापुर नक्सली हमले में भी ऐसा ही प्रतीत हो रहा है। यह पहली बार नहीं है कि नक्सलियों ने हमले को अंजाम दिया है।

संपादकीय : नक्सलियों के खिलाफ निर्णायक एक्शन हो
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संपादकीय लेख

आखिर कब तक हमारे जवानों की शहादत होती रहेगी। मुट्ठी भर नक्सली बड़े-बड़े हमले को अंजाम दे देते हैं और हमारे मजबूत सुरक्षा बल उचित प्लानिंग के अभाव में मात खा जाते हैं। छत्तीसगढ़ के बीजापुर में 24 जवानों की शहादत ऑपरेशनल प्लानिंग की नाकामी की ओर इशारा कर रही है। नक्सलियों ने 700 जवानों को घेर कर तीन घंटे गोलियां चलाईं, ये सब तब हुआ, जब 20 दिन पहले से ही इस इलाके में नक्सलियों की बड़ी तादाद में मौजूदगी की जानकारी मिल गई थी। जिस इलाके में मुठभेड़ हुई है, वह नक्सलियों की फर्स्ट बटालियन का कार्यक्षेत्र है। 20 दिन पहले यूएवी की तस्वीरों के जरिए पता चला था कि यहां बड़ी संख्या में नक्सली मौजूद हैं। ऑपरेशन में सीआरपीएफ, एसटीएफ, डीआरजी, कोबरा और बस्तरिया जैसे उच्च स्तरीय प्रशिक्षित सुरक्षा बलों को शामिल किया गया।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र के वरिष्ठ सुरक्षा सलाहकार व सीआरपीएफ के पूर्व डीजीपी के. विजय कुमार के अलावा मौजूदा आईजी ऑपरेशंस नलिन प्रभात पिछले 20 दिनों से जगदलपुर, रायपुर व बीजापुर के क्षेत्रों में खुद मौजूद थे। इसके बावजूद इतनी बड़ी संख्या में जवानों का शहीद होना पूरी ऑपरेशनल प्लानिंग पर सवाल खड़े कर रहा है। खुफिया तंत्र की कार्यप्रणाली में भी बदलाव की जरूरत है। क्या हमारे उच्च अधिकारियों को यह नहीं पता कि एक ही इलाके में बड़े अधिकारियों की मौजूदगी नक्सलियों को भी अलर्ट कर देती है। उन्हें बड़े अधिकारियों के लगातार मूवमेंट की भनक लग जाती है, जिसके अनुसार वो अपनी प्लानिंग करते हैं। बीजापुर नक्सली हमले में भी ऐसा ही प्रतीत हो रहा है। यह पहली बार नहीं है कि नक्सलियों ने हमले को अंजाम दिया है। वर्षों से वे सुरक्षा बलों को निशाना बाते रहे हैं। छत्तीसगढ़ में 15 साल ताक लगातार भाजपा का शासन रहा, बाकी समय में कांग्रेस की सरकार रही, लेकिन नक्सल समस्या ज्यों की त्यों बनी रही, आज तक राज्य तमाम प्रयासों के बावजूद नक्सल मुक्त नहीं हो पाया। देश में लाल गलियारा आंध्र प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक है।

गृह मंत्रालय के रिकार्ड के मुताबिक देश में करीब 9000 नक्सली हैँ, इनमें से केवल 6000 ही सक्रिय हैं। संख्या के हिसाब से इतने कम नक्सली करी चार दशक से देल के लिए नासूर बने हुए हैं तो यह सरकार की नीतिगत विफलता है। नक्सलवाद के खात्मे के लिए केंद्र व राज्य सरकारों को वक्त के साथ अपनी नीति बदलनी चाहिए। छत्तीसगढ़ के गोरिल्ला वॉरफेयर इलाकों में सुरक्षाबल लंबे समय तक एक ही रणनीति के साथ सफलता हासिल नहीं कर सकते। सलवा जुडूम का क्या हुआ, अब तक सवाल हैं। बड़े अधिकारियों का काम यही होता है कि वो रणनीतिक बदलाव करके नक्सल मूवमेंट को कमजोर करें। नक्सलवाद को राजनीतिक नफा-नुकसान के चश्मे से नहीं देखा जा सकता है। किसी भी दल की सरकार हो, उसे समयबद्ध तरीके से नक्सलवाद के अंत के लिए काम करना चाहिए। नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई में हद से ज्यादा टेक्नोलॉजी पर निर्भरता भी ठीक नहीं है।

बीजापुर के इस नक्सली हमले से पहले अन आर्म्ड व्हिकल (यूएवी) या ड्रोन से मिली फोटो और वीडियो के आधार पर यहां ऑपरेशन प्लान किया गया, लेकिन इस क्षेत्र में 100-200 नक्सलियों का मूवमेंट दिखना आम बात है। इसे आप किसी ऑपरेशन को प्लान करने का इंटेलिजेंस इनपुट नहीं मान सकते। ये हमले लोकल लेवल पर ह्यूमन इंटेलिजेंस की कमी की पोल खोल रहे हैं। अलग कमांड और ट्रेनिंग से भी हमारे सुरक्षा बल आशातीत रिजल्ट नहीं दे पाते। छत्तीसगढ़ में पांच तरह की अलग-अलग फोर्सेज की ऐसे ऑपरेशन में मौजूदगी कमांड व कंट्रोल के लिए बड़ी चुनौती है, जबकि नक्सलियों की ट्रेनिंग और कमांड हमेशा एक ही रहता है। गृहमंत्रालय को इस ओर ध्यान देना चाहिए। नक्सलियों से लड़ने के लिए एक कमांड व ट्रेनिंग हो तो अच्छा होगा। नक्सलियों के खिलाफ अब निर्णायक कार्रवाई होनी ही चाहिए।

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