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पुलिस पर हमला, देश पर हमला

हाल में कश्मीर घाटी में एक नई प्रवृत्ति उभरी है।

पुलिस पर हमला, देश पर हमला

जम्मू कश्मीर से जितनी खबरें हमारे पास पहुंच रही हैं वो वाकई भयावह हैं। पहली नजर में तस्वीर यह बनती है कि जम्मू-कश्मीर की स्थिति नियंत्रण से बाहर जा रही है। हालांकि इसका दूसरा पक्ष भी है।

आखिर तीन सप्ताह में ऐसा पहली बार हुआ है जब 23 दुर्दांत आतंकवादी भी मारे गए हैं। यहां तक कि नियंत्रण रेखा पार करने का दुस्साहस करने वाले पाकिस्तान की बोर्डर एक्शन टीम यानी बैट के दो जवानों को भी अपनी जान गंवानी पड़ी।

किंतु कुल मिलाकर सुरक्षा बलों पर आतंकवादियों का लगातार हमला, आतंकवादियों के पक्ष में जनता के एक वर्ग का खड़ा होना तथा उनके बचाव के लिए सुरक्षा बलों के खिलाफ पत्थरबाजी करना हम सबको आतंकित करता है।

हाल में कश्मीर घाटी में एक नई प्रवृत्ति उभरी है। सेना और अर्धसैनिक बलों पर लंबे समय से हमले हो रहे हैं, लेकिन वहां की स्थानीय पुलिस पर हमले नहीं होते थे। हाल मंे यह स्थिति बदली है।

जिस तरह एक पुलिस उपाधीक्षक को श्रीनगर में जामिया मस्जिद के बाहर पीट-पीटकर मार डाला गया उसकी कल्पना कुछ समय पहले तक नहीं की जा सकती थी। पुलिस पर यह कोई पहला हमला नहीं है।

इसके पूर्व आतंकवादियों ने एक साथ पेट्रोलिंग पर निकले छह पुलिस वालांे की हत्या कर दी। उसके पहले दो कांस्टेबलों की हत्या की गई। जाहिर है, इस नई प्रवृत्ति को कुछ लोग एक खतरनाक स्थिति की शुरुआत मान रहे हैं और मानना भी चाहिए।

आखिर पुलिस बहुत कठिन स्थिति में अपनी भूमिका निभाती है। अगर इस तरह पुलिस पर हमले होते रहे तो उसके लिए अपनी भूमिका निभाना कठिन हो जाएगा। पुलिस महकमे मंें इन घटनाओं के बाद किस तरह की सोच उभर रही होगी, इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है।

किंतु प्रश्न उठता है कि आखिर पुलिस के विरुद्ध इस ढंग की हिंसक और विरोधी प्रवृत्ति क्यों उभरी है। जो आतंकवादी कल तक कहते थे कि हमारी लड़ाई सेना से हैं, आरपीएफ, बीएसएफ से है।

जम्मू कश्मीर की पुलिस से नहीं, वही अब पुलिस के साथ भी दुश्मन की तरह व्यवहार करने लगे हैं। बुरहान वानी का वीडियो देखिए तो उसमें पुलिस वालों को वह अपने कह रहा है।

जाहिर हैए अगर इस सोच में बदलाव आ रहा है तो इसका कुछ कारण होगा। जम्मू कश्मीर पुलिस पर अलगाववादियों एवं आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति रखने का आरोप लगता रहा है।

यह आरोप गलत भी नहीं था। अलगाववादियों के समर्थकों पर मजबूरी आ जाने पर सामान्य धाराओं में मुकदमे दर्ज किए जाते रहे हैं ताकि वे आसानी से छूट जाएं। हाल के दिनों में कश्मीर की सुरक्षा कार्रवाई की रणनीति बदली है।

आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई में सेना पुलिस को आगे लेकर चल रही है। इससे सेना को सफलता मिल रही है, किंतु दूसरी ओर आतंकियों व अलगावादियों तथा उनके समर्थकों को यह लगने लगा है कि जिस पुलिस को हमारा साथ देना चाहिए वह हमारे दुश्मनों का साथ दे रही है।

इस कारण उनके अंदर पुलिस के खिलाफ गुस्सा बढ़ा है और यह हाल के हमलों में दिखा है। तो इसका अर्थ है कि आगे पुलिस बल पर और हमला हो सकता है।

पुलिस को भी समझना होगा कि आप जितना अलगाववादियों को नजरअंदाज करेंगे वह एक दिन खतरनाक साबित हो सकता है, इसलिए खुद को तथा साथियांें को बचाने तथा कश्मीर को बचाने के लिए पुलिस को उसकी असली भूमिका में आना अब अपरिहार्य हो गया है।

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