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बुद्ध पूर्णिमा पर विशेष: हमेशा रहाे सचेत और जागरूक

जन्म व महापरिनिर्वाण तो मानव के जन्म व मृत्यु का प्रतीक है, लेकिन सम्य्क संबोधि तो लाखों वर्षों में एकाध बार ही होती है।

बुद्ध पूर्णिमा पर विशेष: हमेशा रहाे सचेत और जागरूक

आनंद श्री कृष्ण का लेख: बुद्ध पूर्णिमा को त्रिविध पावन माना जाता है क्योंकि बुद्ध के जीवन की तीन महत्वपूर्ण घटनाएं जन्म, सम्यक संबोधी प्राप्ति और महापरिनिर्वाण वैशाख पूर्णिमा के दिन ही हुई थीं। वैशाख पूर्णिमा को उनका लुम्बिनी में जन्म हुआ, बोध गया में उन्हें सम्यक संबोधि प्राप्ति हुई व कुशीनारा में उनका महापरिनिर्वाण हुआ। इन तीनों में सम्यक संबोधि का सबसे अधिक महत्व है।

जन्म व महापरिनिर्वाण तो मानव के जन्म व मृत्यु का प्रतीक है, लेकिन सम्य्क संबोधि तो लाखों वर्षों में एकाध बार ही होती है। 16 वर्ष की उम्र में राजकुमारी यशोधरा से उनका विवाह हुआ,13 वर्ष तक दाम्पत्य जीवन और एक पुत्र के पिता बनने के बाद 29 वर्ष की आयु में सत्य की खोज में सिद्धार्थ गौतम ने महाभिनिष्क्रमण किया और 6 वर्षों तक कठिन तपस्या करने के बाद अनुभव किया कि शरीर को अत्यधिक कष्ट देने से या विलासिता पूर्ण जीवन से संबोधि प्राप्त नहीं हो सकती इसलिए विपस्सना का मार्ग चुना। बुद्ध ने विपस्सना करते-करते अणुओं-परमाणुओं का विच्छेंदन, विश्लेषण-विभाजन करते-करते देखा कि लोग बाहरी कारणों जैसे गरीबी, भुखमरी, असमानता, ऊंच-नीच, बीमारी, बुढ़ापा, मृत्यु, प्राकृतिक आपदाओं से तो दु:खी हैं ही, मनचाहा न होने पर, अनचाहा होने पर, प्रिय लोगों से बिछुड़ने, अप्रिय लोगों से मिलाप जैसी स्थितियों से भी दु:खी होते हैं। बुद्ध ने ध्यान करते-करते खोज निकाला कि हमारे दु:ख का मूल कारण यह है कि हम घटने वाली घटनाओं और स्थितियों के सही स्वभाव से अनजान हैं। बुद्ध ने अणुओं-परमाणुओं का निरीक्षण-परीक्षण करते हुए प्रत्यक्ष अनुभव से जाना कि संसार में कुछ भी स्थिर नहीं है, सब कुछ परिवर्तनशील है जो हर पल बदल रहा है इसलिए सब कुछ अनित्य है।

ऊपर से ठोस दिखने वाले इस शरीर में और इसके साथ जुड़े चित्त में और इन दोनों के मिलने से चलने वाली जीवनधारा में कहीं पर कुछ भी मैं नामक चीज नहीं है। पूरे अस्तित्व में किसी का भी पृथक और स्वतंत्र अस्तित्‍व नहीं है। सब कुछ, प्रत्येक प्राणी-वस्तु, घटना बहुत सी बातों पर, चीजों पर निर्भर है और सभी कुछ किसी न किसी कारण से उत्पन्न होता है, विकसित होता है और देखते-देखते किसी नए रूप में परिवर्तित हो जाता है, कुछ भी किसी एक मूल स्रोत से उत्पन्न नहीं हुआ है, एक बीज जब जमीन में बोया जाता है तो वह जल, मिट्टी हवा की मिली-जुली मदद से ही अंकुरित हो पाता है और सूर्यप्रकाश की मदद से बड़ा होता है। इस तरह पेड़ की एक पत्ती में पूरे ब्रह्मांड का प्रतिनिधित्व होता है जिसमें जल, वायु, पृथ्वीे, अग्नि सभी कुछ समाया हुआ है। किसी व्यक्ति का अपना अकेले का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। वह जीने के लिए पर्यावरण पर, पेड़-पौधों पर, जीव-जंतुओं पर और समाज पर निर्भर है। अगर वह शील-सदाचार का जीवन जीता है तो अपनी सुख और शान्ति से समाज के अन्य‍ प्राणियों की सुख-शांति में मदद करता है। प्रज्ञा जगाता है, दान-शील और करूणावान बनता है तो दूसरे लोगों के प्रति मंगल मैत्री जगाता है, करूणा जगाता है जिससे समाज में जो भी लोग दु:खी हैं, उनका दु:ख दूर करने की कोशिश करता है। सत्य को केवल स्वयं के प्रत्यक्ष अनुभव से ही जाना जा सकता है। इस तरह विपस्सना करते-करते 35 वर्ष की आयु में सन्ा 528 ई. पूर्व की वैशाख पूर्णिमा को बुद्धत्व‍ प्राप्त कर सिद्धार्थ गौतम सम्यक संबुद्ध बन गए।

अगर वह शील-सदाचार का जीवन जीता है तो अपनी सुख और शान्ति से समाज के अन्य‍ प्राणियों की सुख-शांति में मदद करता है। प्रज्ञा जगाता है, दान-शील और करूणावान बनता है तो दूसरे लोगों के प्रति मंगल मैत्री जगाता है, करूणा जगाता है जिससे समाज में जो भी लोग दु:खी हैं, उनका दु:ख दूर करने की कोशिश करता है।

सत्य को केवल स्वयं के प्रत्यक्ष अनुभव से ही जाना जा सकता है। इस तरह विपस्सना करते-करते 35 वर्ष की आयु में सन्ा 528 ई. पूर्व की वैशाख पूर्णिमा को बुद्धत्व‍ प्राप्त कर सिद्धार्थ गौतम सम्यक संबुद्ध बन गए। 45 वर्षों तक करूण चित्त से गांव कस्बों में पैदल जाकर मानव कल्याण के लिए लोगों को धम्म सिखाते रहे। वैशाख पूर्णिमा के दिन बुद्ध भिक्खु संघ के साथ कुशीनगर पहुंचे। भिक्खुओं को अंतिम बार संबोधित करते हुए भगवान बुद्ध ने कहा, वयधम्मां संखारा, अप्पमादेन सम्पादेथ। भिक्खुओं, सारे संखार व्ययधर्मा हैं, मरणधर्मा हैं, नष्टधर्मा हैं। जितनी भी संस्कृत अर्थात निर्मित वस्तुएं हैं, व्यक्ति हैं, घटनाएं हैं, स्थितियां हैं, वे सब नश्वर हैं, भंगुर हैं, मरणशील हैं, परिवर्तनशील हैं। यही प्रकृति का कठोर सत्य है। प्रमाद से बचते हुए, आलस्य से दूर रहते हुए, सतत सचेत और जागरूक रहते हुए, प्रकृति के इस सत्य का संपादन करते रहो! इस सत्य से स्थित रहकर अपना कल्याण साधते रहो। यह अंतिम उपदेश देकर वैशाख पूर्णिमा की रात के तीसरे पहर में 483 ई.पू. को तथागत महापरिनिर्वाण को प्राप्त हुए। जैसे दीपक की लौ उठकर बुझ जाने के बाद चली जाती है, वैसे ही महापरिनिर्वाण प्राप्ति कर बुद्ध चले जाते हैं। सबका मंगल हो, सबका कल्याण हो।

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