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चिंतन : जनता के प्रति जवाबदेह प्रशासन तंत्र की जरूरत

लोकसेवा दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आइएएस अफसरों की ली क्लास

चिंतन : जनता के प्रति जवाबदेह प्रशासन तंत्र की जरूरत

लोकसेवा दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आइएएस अफसरों की 'जमीर' को झकझोर कर उन्हें जनता के प्रति बड़ी जिम्मेदारी का एहसास कराया है। पीएम ने कहा कि जिलों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए। इससे सकारात्मक बदलाव के लिए हितकार माहौल तैयार होगा। जिला में आप नौकरी नहीं सेवा कर रहे हैं। नई सोच से ही देश का कल्याण संभव है। अगर हम प्रयोग नहीं करेंगे, तो व्यवस्था कैसे बदलेगी। आप देश के सवा सौ करोड़ लोगों की किस्मत बदल सकते हैं। दरअसल, भारतीय प्रशासनिक तंत्र में आज व्यापक सुधार की जरूरत महसूस की जा रही है। अंग्रेजों के बनाए ढांचे पर खड़े किए गए इस प्रशासनिक तंत्र में जनता के प्रति जवाबदेही का नितांत अभाव है।

अफसरों की ऐसी सोच बनाई गई कि वे जनता पर शासन करने के लिए हैं। आजादी के बाद भी हमने अपने प्रशासनिक तंत्र में देश की जरूरत के अनुरूप पूरी तरह से बदलाव नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि हमारी अफसरशाही निरंकुश होती गई, कभी जनता के प्रति जवाबदेह नहीं हुई। इससे जनता और अफसरों के बीच दूरी बढ़ती गई। भारत के संदर्भ में कहा जाता है कि पीएम, सीएम और डीएम देश चलाते हैं। इनमें भी डीएम (जिलाधिकारी) देश की सभी सरकारी योजनाओं के संचालन की रीढ़ है। इसलिए डीएम बनने के लिए सिविल सेवा परीक्षा के जरिये श्रेष्ठ प्रतिभा का चयन किया जाता है।
हिंदुस्तानी समाज में किसी का आइएएस बनना गर्व की बात मानी जाती है, लेकिन इन्हीं श्रेष्ठ प्रतिभाओं पर भ्रष्ट, निरंकुश, गैरजिम्मेदार और देश को खोखला करने वाले होने के आरोप लगते रहे हैं। आजादी के 68 वर्षों में भारतीय आइएएस अधिकारियों की छवि दुनिया में भ्रष्टतम अफसरों में एक की बन गई। 'लालफीताशाही' का इतना आतंक व्याप्त हो गया कि इसके सामने सरकारें बौनी प्रतीत होने लगीं। केंद्र सरकार ने अफसरशाही में बदलाव लाने के लिए 5 जून 1966 में मोरारजी देसाई की अध्यक्षता में पहला प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन किया। 1991 में उदारीकरण के युग की शुरूआत के साथ लालफीताशाही पर अंकुश लगाया गया। 5 अगस्त 2005 को दूसरा प्रशासनिक सुधार आयोग वीरप्पा मोईली की अध्यक्षता में गठित की गई।
इन आयोगों के सुझावों पर कुछ सुधार भी हुए, पर अभी भी प्रशासनिक तंत्र में सुधार के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है। हमें एक पारदर्शी व जवाबदेह एडमिनिस्ट्रेटिव मॉडल बनाना होगा, जिसमें परफॉर्मेंस पैमाना हो। पीएम मोदी ने इस ओर ध्यान दिया है। वे अफसरों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाना चाहते हैं। इसके लिए वे तकनीकी रिफॉर्म से इतर अफसरों पर नैतिक दबाव बनाना चाहते हैं। वे लगातार यह कोशिश कर रहे हैं कि उनकी सरकार का उनपर पूर्ण भरोसा है। देश ने देखा कि शपथ लेने के अगले ही दिन पीएम मोदी ने केंद्रीय अफसरों के साथ बैठक की। देश में अब तक किसी भी प्रधानमंत्री ने ऐसा नहीं किया था। मोदी बाबुओं को अधिक से अधिक जिम्मेदार बनाने की कोशिश कर रहे हैं। चूंकि जब तक डीएम सक्रिय नहीं होंगे, तब तक सरकार की कोई भी जनयोजना धरातल पर नहीं उतरेगी।
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