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2019 को लेकर सोनिया गांधी का बड़ा दावा, ‘शाइनिंग इंडिया’ के बाद अब ‘अच्छे दिन’ भी समाप्त होंगे

यूपीए की अध्यक्ष एवं पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का दावा है कि 2019 में कांग्रेस और यूपीए की सत्ता में वापसी होगी। जिस तरह अटल बिहारी वाजपेयी का ‘शाइनिंग इंडिया’ (भारत उदय) अभियान फेल हुआ था, उसी तरह प्रधानमंत्री मोदी के ‘अच्छे दिन’ भी समाप्त होंगे।

2019 को लेकर सोनिया गांधी का बड़ा दावा, ‘शाइनिंग इंडिया’ के बाद अब ‘अच्छे दिन’ भी समाप्त होंगे

यूपीए की अध्यक्ष एवं पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का दावा है कि 2019 में कांग्रेस और यूपीए की सत्ता में वापसी होगी। जिस तरह अटल बिहारी वाजपेयी का ‘शाइनिंग इंडिया’ (भारत उदय) अभियान फेल हुआ था, उसी तरह प्रधानमंत्री मोदी के ‘अच्छे दिन’ भी समाप्त होंगे। सोनिया गांधी ने किस आधार पर यह विश्लेषण दिया है, हमें जानकारी नहीं है, लेकिन कांग्रेस की राजनीतिक दुरावस्था क्या है, वह देश की जनता ने ही तय की है।

जो कांग्रेस 2014 में देश के 13 राज्यों में सत्तारूढ़ थी, आज सिमटकर कर्नाटक, पंजाब, मिजोरम और पुडुचेरी, यानी चार राज्यों में ही सत्तासीन रह गई है। कर्नाटक में अप्रैल-मई में चुनाव होने हैं और मिजोरम में भी इसी साल के अंत में चुनाव तय हैं। बेशक पुडुचेरी में कांग्रेस सरकार है, लेकिन वह पूर्ण राज्य नहीं, बल्कि संघशासित क्षेत्र है।

राजनीति शास्त्र की परिभाषा के मुताबिक, कांग्रेस मात्र पंजाब में ही सत्तारूढ़ रह गई है। यदि कांग्रेस कर्नाटक और मिजोरम में अपनी सरकारें बचाने में कामयाब रहती है, तो फिर हम उन्हें भी कांग्रेस के हिस्से दर्ज करके गिन लेंगे। फिलहाल मामला चुनावी प्रक्रिया का है। आखिर सोनिया गांधी किस ताकत के बूते 2019 का दावा कर रही हैं।

यह कोई राजनीतिक बयान भी नहीं है। उन्होंने यह दावा एक मीडिया समूह द्वारा आयोजित विचार सम्मेलन के सार्वजनिक मंच से किया है। बौद्धिक जनसमूह के बीच कुछ भी संवाद करना या दावा करना राष्ट्रीय महत्व का माना जाता है। हाल ही में पूर्वोत्तर के तीन महत्वपूर्ण राज्यों-त्रिपुरा, नगालैंड, मेघालय-में चुनाव संपन्न हुए हैं। त्रिपुरा और नगालैंड में कांग्रेस का एक भी विधायक जीत नहीं सका है।

मेघालय में 21 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस ही रही, लेकिन सरकार बनाने को उसे मात्र 10 विधायकों का समर्थन भी नसीब नहीं हो सका। ये ताजातरीन और प्रमुख उदाहरण हैं। जिस पूर्वोत्तर में कांग्रेस का परचम लहराया करता था और भाजपा का कोई नामलेवा भी नहीं था, उसी क्षेत्र के असम, अरुणाचल, मणिपुर, सिक्किम समेत तीन हालिया राज्य आज भाजपा और एनडीए की झोली में है।

सियासत और सत्ता का 360 डिग्री पर बदलाव! तो फिर सोनिया गांधी किस आधार पर 2019 में सत्तारूढ़ होने के सपने देख रही हैं? कमोबेश जनता के सामने अपना कार्यक्रम और नीतियां तो रखनी पड़ेंगी। जनादेश उन्हीें के आधार पर तय होते हैं। नोटबंदी को फाड़ कर कूड़े के डिब्बे में फेंक देता या गब्बर सिंह टैक्स अथवा विदेशों में मोदी सरकार को गरिया कर, देश में भय, टूटन, बिखराव और संविधान खतरे में है-ऐसी छिछली बातें करने और देश की बदनामी करने से कांग्रेस की सत्ता में वापसी तय हो जाएगी।

क्या सोनिया गांधी ऐसा सोच रही हैं। बहरहाल 2019 का ‘दिवास्वप्न’ पूरा करने की खातिर सोनिया गांधी ने समान विचार वाले, यानी पूर्व समर्थक, दलों को साथ-साथ आने का आह्वान किया है। उन्होंने 13 मार्च को विपक्षी नेताओं का डिनर आयोजित किया है। उस रात्रि का यथार्थ बाद में देखेंगे, लेकिन फिलहाल तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री एवं तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी त्रिपुरा में यथासमय गठबंधन न करने से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से नाराज हैं। ध्यान रहे कि इस पार्टी के लोकसभा में 36 सांसद हैं। यानी कांग्रेस के बाद तीसरी सबसे बड़ी ताकत।

इसके अलावा, सबसे बड़ी वामपंथी पार्टी सीपीएम की पोलित ब्यूरो बैठक में महासचिव सीताराम येचुरी कांग्रेस के साथ चुनाव-पूर्व गठबंधन का प्रस्ताव पारित नहीं करा पाए। पूर्व महासचिव प्रकाश करात ने जमकर विरोध किया और अंततः तय हुआ कि आगामी लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद ही इस मुद्दे पर विचार किया जाएगा। ओडिशा का बीजू जनता दल और मुख्यमंत्री नवीन पटनायक न तो कांग्रेस के साथ आना चाहते हैं और न ही उन्होंने राहुल गांधी के नेतृत्व पर मुहर लगाई है।

समाजवादी पार्टी और बसपा का जहां तक सवाल है, उनकी राजनीति 14 मार्च को गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनावों के नतीजों के बाद ही तय होगी। वैसे कांग्रेस-सपा का गठबंधन उप्र के विधानसभा चुनावों में ध्वस्त हो चुका है। आखिर सोनिया गांधी किन दलों के सहयोग और गठबंधन के आधार पर 2019 का सपना देख रही हैं? यदि वह शिवसेना और तेलुगूदेशम पार्टी के एनडीए के प्रति नाराज़गी से खुश हैं और उन्हें अपने पाले में देखना चाहती हैं, तो यह उनकी बहुत बड़ी खुशफहमी होगी।

क्या कांग्रेस लालू यादव, उमर अब्दुल्ला, मांझी, सीपीआई, आरएसपी, फाॅरवर्ड ब्लाॅक, पीस पार्टी, केरल कांग्रेस, मुस्लिम लीग, एनसीपी सरीखी क्षेत्रीय पार्टियों के बूते ही केंद्र में सत्तासीन होने का सपना देख रही हैं? बेशक गांधी परिवार और कांग्रेस मोदी सरकार को कितना भी कोस लें, लेकिन हकीकत है कि जनता का अब भी प्रधानमंत्री मोदी में विश्वास है।

यदि देश की आज अर्थव्यवस्था 152.51 लाख करोड़ रुपये की है, विकास दर 7.2 फीसदी की है, विदेशी मुद्रा कोष 421 अरब डाॅलर का है, प्रति व्यक्ति औसत आय 1,11,782 रुपये है,करीब छह करोड़ घरों को मुफ्त गैस कनेक्शन हासिल हुए हैं, कृषि दर औसत 4.1 फीसदी है,तो मोदी सरकार ने कुछ काम जरूर किए हैं। मोदी सरकार की उपलब्धियों का विश्लेषण फिर कभी करेंगे,

लेकिन यह भी सोच-विचार का मुद्दा होना चाहिए कि भाजपा चुनाव-दर-चुनाव जीतते हुए आज देश के 22 राज्यों में सत्तारूढ़ क्यों है? आखिर उसे जनादेश प्राप्त हो रहे होंगे। इसके अलावा, आरएसएस ने 2025 तक देश के 25 करोड़ घरों तक पहुंचने का लक्ष्य तय किया है। 2019 का विजय-मंत्र अभी से तैयारी की स्थिति में है। सोनिया गांधी और कांग्रेस के पास इतना व्यापक संगठन है, जो संघ की ताकत का मुकाबला कर सके? बहरहाल 2019 फिलहाल दूर है, लेकिन कांग्रेस मुगालते में रहना चाहे, तो कोई आपत्ति नहीं है।

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