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भारतीय सेना की जांबाजी की मिसाल है सियाचिन, जानें कितनी मुश्किल होती है सैनिकों की जिंदगी

केंद्र की मोदी सरकार 2 में रक्षामंत्री के तौर पर कार्यभार संभालने के बाद राजनाथ सिंह आज सियाचिन पहुंचे। इस दौरान उनके साथ सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत भी मौजूद रहे। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह जवानों का हौंसला बढ़ाने के लिए सियाचिन ग्लेशियर पहुंचे है। आइए सियाचिन और वहां तैनात हमारे जवानों के बारे में जानते हैं जिसे दुनिया का सबसे ऊंचा रणक्षेत्र कहा जाता है।

भारतीय सेना की जांबाजी की मिसाल है सियाचिन, जानें कितनी मुश्किल होती है सैनिकों की जिंदगी
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केंद्र की मोदी सरकार 2 में रक्षामंत्री के तौर पर कार्यभार संभालने के बाद राजनाथ सिंह आज सियाचिन पहुंचे। इस दौरान उनके साथ सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत भी मौजूद रहे। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह जवानों का हौंसला बढ़ाने के लिए सियाचिन ग्लेशियर पहुंचे है। आइए सियाचिन और वहां तैनात हमारे जवानों के बारे में जानते हैं जिसे दुनिया का सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र कहा जाता है।

सियाचिन में देश के जवानों को कठिन परिस्थियों में रहना पड़ता है, इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बीते तीस सालों में यहां ग्यारह सौ से ज्यादा जवान शहीद हुए हैं। देश के दस हजार जवान यहां डेरा जमाकर आतंकियों और दुश्मनों के मंसूबों को नाकाम करते हैं।




सियाचिन ग्लेशियर की ऊंचाई बीस हजार फुट है। यहां सैनिक समूह के साथ चलते हैं, सभी के पैर एक रस्सी के साथ बंधे होते हैं ताकि कोई साथी गिर जाए या फिसल जाए तो सभी को इसकी खबर मिल जाए। सैनिकों को ऊंचाई वाली जिस जगह पर तैनात किया जाता है उसके लिए दस दिन पूर्व बेस कैंप से निकलने की तैयारी करनी होती है। दिन में बर्फ पिघलने से मुसीबतें ज्यादा बढ़ जाती हैं इसिए जवान रात ढाई या तीन बजे अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए निकलते हैं ताकि नौ बजे से पहले वहां पहुंचा जा सके।




शून्य से कम तापमान के बीच प्रत्येक जवान को एक बीस या तीस किलो का बैग रखना होता है जिसमें हथियार, कुल्हाड़ी (बर्फ के बीच रास्ता बनाने के लिए) और रोजमर्रा का जरूरी सामान होता है। इतनी ठंड के बीच जवानों को छह-सात तह मोटे और गर्म कपड़े पहनने पड़ते हैं। गर्मी बढ़ने के साथ बर्फ की परतों की टूटने की आवाजें भी सुनाई पड़ती हैं।




इसके अलावा जवानों को इस खतरनाक मौसम के बीच खाने का भी विशेष ख्याल रखना होता है। खाने में तरल पदार्थों का इस्तेमाल ज्यादा होता है। खाने का सामान टीन के कैन में पैक किया जाता है। अगर सूप पीना है तो उसे पहले पिघलाना पड़ता है। टीन का कैन जमने पर उसे आग के सामने रखकर नरम किया जाता है। कभी-कभी तापमान शून्य से 60 डिग्री नीचे चला जाता है तो सूप को जितनी जल्दी हो सके पीना पड़ता है, नहीं तो वह फिर से जम सकता है।




सैनिकों के हाथ बंधे होते हैं और उनपर भी मोटे कपड़ों की तह होती है इस वजह से दूध के कैन को खोलने में आधे घंटे से ज्यादा का समय लग जाता है। मौसम के हिसाब चॉकलेट और सूखे मेवे सैनिकों के लिए काफी बेहतर माने जाते हैं क्योंकि वो बर्फ में जमते नहीं और जम भी जाएं तो उन्हें पिघलाने की जरूरत नहीं पड़ती। जवानों को बर्फ पिघलाकर ही पानी पीना पड़ता। इसमें भी सावधानी बरतनी होती है क्योंकि बर्फ भी दूषित हो सकता है।




बहुत ज्यादा सर्दी में भूख की कमी भी बड़ी समस्या है लेकिन जवानों को जिंदा रहने के लिए कुछ न कुछ खाना पड़ता है। गर्म किए खाने और पेय पदार्थ को ठंडा होने से पहले लेना पड़ता है जिसका असर सैनिकों के पाचन तंत्र पर पड़ता है। इसलिए किसी सेहतमंत जवान को भी टॉयलेट में 2-3 घंटे वक्त लग जाता है। नहाने के लिए जो पानी उपयोग होता है वह जमे नहीं इसके लिए उसे बराबर स्टोव पर रखा जाता है। केरोसिन तेल यहां तैनात जवानों के लिए लाइफलाइन है क्योंकि इसी पर सब कुछ निर्भर करता है। पहले इसे कैन में सप्लाई करते थे, लेकिन अब पाइपलाइन बिछा दी गई है।

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