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क्षेत्रीय दलों ने देश में दो दलीय राजनीति की संभावनाओं पर लगाया विराम, दबदबा कायम

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिली अभूतपूर्व सफलता और उसके बाद एक के बाद एक कई राज्यों में उसकी जीत के बाद इस बाद की उम्मीद लगाई जा रहीर थी कि देश में अब दो दलीय राजनीति का ही वर्चस्व कायम हो जाएगा।

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राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा के प्रचंड उभार के बाद भी क्षेत्रीय दलों ने देश में दो दलीय राजनीति की संभावनाओं पर विराम लगा दिया। पार्टी के कर्नाटक तक का सफर तय कर लेने के बावजूद देश के बड़े हिस्से में क्षेत्रीय दलों का दबदबा कायम बना हुआ है। उल्लेखनीय है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिली अभूतपूर्व सफलता और उसके बाद एक के बाद एक कई राज्यों में उसकी जीत के बाद इस बाद की उम्मीद लगाई जा रहीर थी कि देश में अब दो दलीय राजनीति का ही वर्चस्व कायम हो जाएगा।

लेकिन क्षेत्रीय दलों ने अपना दमखम दिखाया और साबित कर दिया कि उसकी प्रासंगिकता को खारिज नहीं किया जा सकता है। 2019 पर ही नजर दौड़ाए तो लोकसभा चुनावों के अलावा 7 राज्यों के विधानसभा भी हुए। जिसमें क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय दलों खासकर भाजपा पर भारी पड़ गए। प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता के चलते भाजपा मौजूदा लोकसभा में 2014 के मुकाबले ज्यादा सीटें जीतने में कामयाब हुई और उसका आंकड़ा 300 के पार निकल गया।

क्षेत्रीय दलों का वजूद रहा कायम लेकिन इसके बावजूद बीजू जनता, डीएमके, वाईएसआर कांग्रेस, टीआरएस और ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस जैसे क्षेत्रीय दलों का वजूद बरकरार रहा और ये पार्टियों अपने-अपने सूबे में भाजपा पर भारी पड़ी। कर्नाटक तक अपनी पैठ कायम करने वाली भाजपा का तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश में खाता तक नहीं खुल पाया। तमिलनाडु में कांग्रेस को डीएमके का पिछलग्गू बनना पड़ा और उसके रहमोकरम पर 4 लोकसभा सीटों को जीतने में कामयाबी मिली।

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