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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अप्रवासी मजदूरों को रुपये भेजना चाहते थे, इस कारण से अटक गई थी योजना

ऐसा नहीं कि केंद्र की मोदी सरकार अप्रवासी मजदूरों को सीधे कैश-ट्रांसफर नहीं करना चाहती थी, मगर सबसे बड़ी समस्या थी कि किसी स्तर पर भी अप्रवासी मजदूरों का पूरा ब्यौरा उपलब्ध नहीं था। सरकार के पास केवल 28 लाख मजदूरों का ही डेटाबेस था जो विभिन्न राज्यों के रीलीफ-कैंप में कोरेंटाइन होने दाखिल हुए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अप्रवासी मजदूरों को रुपये भेजना चाहते थे, इस कारण से अटक गई थी योजना

ऐसा नहीं कि केंद्र की मोदी सरकार अप्रवासी मजदूरों को सीधे कैश-ट्रांसफर नहीं करना चाहती थी, मगर सबसे बड़ी समस्या थी कि किसी स्तर पर भी अप्रवासी मजदूरों का पूरा ब्यौरा उपलब्ध नहीं था। सरकार के पास केवल 28 लाख मजदूरों का ही डेटाबेस था जो विभिन्न राज्यों के रीलीफ-कैंप में कोरेंटाइन होने दाखिल हुए। पर एक अनुमान के मुताबिक देशभर में तकरीबन 8 करोड़ मजदूर हैं जो अपने राज्यों से निकलकर शहरों में काम कर रहे हैं।

राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के पूर्व अध्यक्ष पीसी मोहनन अप्रवासी मजदूरों की गिनती के सवाल पर कहते हैं, किसी भी राज्य से किसी भी काम के लिए बाहर गया कोई भी नागरिक चाहे वो क्लास-वन नौकरी में क्यों न हो, उसे 2011 की जनगणना के अनुसार अप्रवासी मजदूर की श्रेणी में रखा गया है। मगर अप्रवासी दिहाड़ी मजदूरों की गणना का अब तक कोई मैकेनिज्म नहीं बना था।

सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े विश्वस्त सूत्रों ने हरिभूमि को बताया कि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के सुझाव से पहले ही इस विषय पर केंद्र सरकार के विभिन्न उच्चस्तरीय बैठकों में चर्चा हुई थी कि मजदूरों को नगद राशि का भुगतान करने से आर्थिक गतिविधियां भी बढेंगी और उन्हें बड़ी राहत मिलेगी।

आंकड़ों और नाम, पता, बैंक एकाउंट, आधार कार्ड इत्यादि की जानकारी नहीं होने की वजह से ये संभव नहीं हो सका। यही वजह रही कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब 20 लाख करोड़ रुपए के कोविड-19 राहत पैकेज का ऐलान किया तो उसमें अप्रवासी मजदूरों के लिए कैश देने का उल्लेख नहीं किया जा सका।

मजदूरों का डाटाबेस तैयार करने चल रहा काम

सूत्रों ने बताया कि मजदूरों का डाटाबेस अब पूरी तरह तैयार करने का मैकेनिज्म केंद्रीय गृहमंत्रालय के नेतृत्व में चल रहा है। एक-एक मजदूरों की केवल पूरी जानकारी ही नहीं बल्कि उनकी आवाजाही, कामकाज, ठिकाना और मौजूदा स्थिति पर नजर रखने का इंतजाम हो रहा है। उन्हें किसी तरह की कोई परेशानी भविष्य में न हो इसके लिए ही उनकी गांव वापसी के साथ केंद्र सरकार ने 40 हजार करोड़ रुपए के मनरेगा का बजट बढ़ाकर 1 लाख करोड़ कर दिया है।

श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलाकर उन्हें उनके गंतव्य तक पहुंचाने की फ्री व्यवस्था की गई। सूत्रों ने कहा कि कैश नहीं आवंटित किया जा सका। लेकिन हर अप्रवासी मजदूरों को चाहे उनके पास राशन कार्ड हो या न हो उन्हें 5 किलो गेहूं, चावल और एक किलो चना प्रति परिवार के हिसाब से फ्री वितरित किया गया। केंद्र सरकार ने इस एवज में अब तक 3 हजार 500 करोड़ रुपए खर्चे।

अप्रवासी मजदूरों का कल्याण केंद्र की सवोच्च सूची में

उल्लेखनीय है कि देशभर के सड़कों पर बच्चों सहित अप्रवासी मजदूरों के पैदल हजारों किमी पैदल चलने की खबर से जब देश व्यथित हुआ तो विपक्ष ने भी केंद्र सरकार पर सवालों के तीखे तीर छोड़े। काफी हंगामें के बाद श्रमिक स्पेशल ट्रेन शुरू हो सकी। बिहार जैसे राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तो पहले बिहार के मूल निवासी अप्रवासी मजदूरों को वापिस लाने के लिए साफतौर पर मना कर दिया था। इन सब के बीच अप्रवासी मजदूरों का कल्याण अब केंद्र सरकार की सर्वोच्च सूची में दर्ज है।

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