भारतीय संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में 16 अप्रैल का दिन एक बड़े 'पावर शिफ्ट' के रूप में दर्ज होने जा रहा है। केंद्र सरकार संसद के विशेष सत्र में तीन ऐसे ऐतिहासिक विधेयक पेश करने वाली है, जो न केवल लोकसभा की विधायी संरचना को बदल देंगे, बल्कि 2029 के चुनावों की पूरी तस्वीर बदल देंगे।
मुख्य एजेंडा 2023 में पारित 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' को पूरी तरह सक्रिय करना है। सरकार का लक्ष्य है कि 2029 के चुनावों में 270 से ज्यादा महिलाएं संसद पहुंचे, लेकिन इसके लिए लोकसभा सीटों की कुल संख्या 543 से बढ़ाकर 850 की जानी है। इसी लक्ष्य को साधने के लिए आज सदन में 18 घंटे की मैराथन बहस होने जा रही है।
सत्ता का नया समीकरण: 426 पर बनेगा बहुमत
सीटों की इस भारी बढ़ोतरी के बाद सत्ता हासिल करने का जादुई आंकड़ा भी पूरी तरह बदल जाएगा। वर्तमान में सरकार बनाने के लिए 272 सीटों की जरूरत होती है, लेकिन लोकसभा की क्षमता 850 होने के बाद बहुमत के लिए 426 सीटों की आवश्यकता होगी।
इसके अलावा, नए प्रावधानों के तहत करीब 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएंगी। यह बदलाव केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्रीय और जातीय राजनीति के संतुलन को भी पूरी तरह हिला देगा। विपक्ष, विशेषकर राहुल गांधी ने इसे 'चुनावी क्षेत्रों की मनमानी फेरबदल' और पिछड़ों-दलितों के अधिकारों की 'चोरी' करार देते हुए कड़ा विरोध जताया है।
तीन बिल, जो बदल देंगे विधानसभा से लोकसभा तक की तस्वीर
सरकार आज जो तीन विधेयक पेश करने जा रही है, वे 'नारी शक्ति' के संकल्प को धरातल पर उतारने की दिशा में सबसे बड़े कदम हैं:-
- संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026: यह बिल लोकसभा की अधिकतम संख्या 850 करने का प्रावधान करता है। इसमें 815 सीटें राज्यों के लिए और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों के लिए होंगी।
- परिसीमन विधेयक, 2026: यह 2011 की जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की नई सीमाएं तय करेगा। यही वह बिल है जो तय करेगा कि किस राज्य में कितनी सीटें बढ़ेंगी।
- केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2026: यह दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी जैसे क्षेत्रों में महिला आरक्षण और सीट समायोजन को लागू करेगा।
सीटों की गिनती का गणित: जनसंख्या बनेगी आधार?
प्रस्तावित बिल की धारा 8 परिसीमन आयोग को 'नवीनतम जनगणना' और सांख्यिकीय आंकड़ों के आधार पर सीटों का बंटवारा करने का अधिकार देती है। अनुच्छेद 81 और 82 में संशोधन के जरिए जनसंख्या अभिव्यक्ति को 2011 के आंकड़ों से जोड़ा जा रहा है।
इसका सीधा असर यह होगा कि जिन राज्यों की आबादी तेजी से बढ़ी है, जैसे यूपी, बिहार, राजस्थान, वहां सीटों की संख्या में भारी उछाल आएगा। यूपी में सीटें 80 से बढ़कर 140 तक पहुंच सकती हैं, जिससे उत्तर भारतीय राज्यों का दिल्ली की सत्ता पर दबदबा और भी बढ़ जाएगा।
दक्षिण भारत का आक्रोश: "अच्छे काम की सजा मिल रही है"
इस विधायी कायाकल्प के विरोध में दक्षिण के राज्य तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक एकजुट हो गए हैं। डीएमके सांसद पी. विल्सन ने इसे "राज्यों को दी गई संवैधानिक गारंटियों का उल्लंघन" बताया है। दक्षिण का तर्क है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण को सफलतापूर्वक लागू किया, लेकिन अब उसी जनसंख्या को आधार बनाकर उनकी राजनीतिक ताकत कम की जा रही है।
उनके अनुसार, 1971 की जनगणना के आधार पर जो 'फ्रीज' लगाया गया था, उसे हटाना दक्षिण भारत के हितों के खिलाफ एक बड़ी साजिश है।
सदन में 18 घंटे की बहस: कौन पेश करेगा कौन सा बिल?
लोकसभा की कार्य मंत्रणा समिति ने इस चर्चा के लिए 18 घंटे का समय तय किया है, जो शुक्रवार तक चल सकता है। केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल पहले दो महत्वपूर्ण बिल पेश करेंगे, जबकि गृह मंत्री अमित शाह केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़ा तीसरा विधेयक पेश करेंगे।
सदन में सत्ता पक्ष 'नारी शक्ति' के नाम पर विपक्ष को घेरने की तैयारी में है, वहीं विपक्ष इसे 'सत्ता पर कब्जा करने की कोशिश' बताकर मैराथन बहस के दौरान सरकार को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास करेगा।










