BMC Elections Result 2026: क्यों ढह गया 'ठाकरे ब्रांड' का किला? जानें 5 बड़े कारण, जिनसे मुंबई में 30 साल की सत्ता हुई खत्म

BMC चुनाव 2026 में ठाकरे ब्रांड क्यों हार गया? जानें वे 5 बड़े कारण, जिनकी वजह से मुंबई में 30 साल पुरानी सत्ता का अंत हो गया।

Updated On 2026-01-17 15:41:00 IST

भाजपा के नेतृत्व वाली महायुति ने BMC Elections 2026 में बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया और ठाकरे गुट का दशकों पुराना दबदबा खत्म हो गया। (फाइल फोटो)

BMC Elections Result 2026: मुंबई महानगरपालिका चुनाव 2026 को ठाकरे परिवार की सियासी साख की सबसे बड़ी परीक्षा माना जा रहा था। उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की लंबे समय बाद हुई एकजुटता से यह उम्मीद थी कि मराठी वोट एक मंच पर आएगा। लेकिन चुनावी नतीजों ने इस धारणा को झुठला दिया।

भाजपा के नेतृत्व वाली महायुति ने बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया और ठाकरे गुट का दशकों पुराना दबदबा खत्म हो गया। मुंबई में पिछले 30 साल से ठाकरे का एकछत्र राज रहा है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर वो क्या वजह है, जिसके चलते "ठाकरे ब्रांड" का किला ढह गया? यहां पांच कारणों से समझने की कोशिश की गई है। 

BMC में "ठाकरे ब्रांड" का किला ढहने के 5 कारण


1. मराठी वोट एकजुट नहीं हो सका

ठाकरे भाइयों के साथ आने के बावजूद मराठी मतदाता पूरी तरह एक धड़े में नहीं आए। शिवसेना के विभाजन के बाद एकनाथ शिंदे गुट ने खुद को बालासाहेब ठाकरे की विचारधारा का असली उत्तराधिकारी बताकर बड़ी संख्या में पारंपरिक वोट अपने पक्ष में मोड़ लिया। इसका सीधा नुकसान उद्धव-राज गठबंधन को हुआ।

2. भावनाओं पर भारी पड़ा विकास का एजेंडा

भाजपा-महायुति ने चुनाव में सड़क, मेट्रो, पुनर्विकास और बुनियादी सुविधाओं को केंद्र में रखा। इसके उलट ठाकरे गठबंधन की रणनीति मराठी अस्मिता और भावनात्मक अपील पर अधिक निर्भर रही। महानगर के मतदाताओं ने भावनाओं से ज्यादा सुविधाजनक और भविष्य-केंद्रित राजनीति को चुना।

3. गठबंधन में स्पष्ट नीति की कमी

शिवसेना (UBT) और मनसे के बीच तालमेल केवल चुनावी मंच तक सीमित नजर आया। दोनों दलों के बीच साझा घोषणापत्र और स्पष्ट प्रशासनिक रोडमैप की कमी रही। राज ठाकरे की आक्रामक राजनीति और उद्धव ठाकरे की नरम छवि के बीच संतुलन नहीं बन पाया।

4. कांग्रेस के अलग चुनाव लड़ने का असर

ठाकरे-मनसे समीकरण बनने के बाद कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया। इससे विपक्षी वोट बंट गए, खासकर मुस्लिम और दलित इलाकों में। पहले जहां संयुक्त विपक्ष भाजपा को चुनौती देता था, वहीं इस बार बिखराव ने महायुति की राह आसान कर दी।

5. संगठन और संसाधनों में कमजोरी

भाजपा की मजबूत बूथ मैनेजमेंट, डिजिटल कैंपेन और संसाधनों के सामने ठाकरे गठबंधन कमजोर साबित हुआ। पार्टी चिन्ह और आंतरिक विवादों से शिवसेना (UBT) का संगठन प्रभावित रहा, जबकि मनसे जमीनी स्तर पर अपेक्षित ताकत नहीं दिखा सकी।

BMC नतीजों के क्या हैं मायने?

227 वार्डों वाली BMC में भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। शिवसेना (UBT) को 65 सीटें मिलीं, जबकि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने 29 वार्डों में जीत दर्ज की। मनसे को 6 सीटें ही मिल सकीं।

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