MCD vs BMC: MCD और BMC के मेयर की पावर में कितना फर्क?
राजधानी दिल्ली और देश की आर्थिक राजधानी कहलाने वाली मुंबई दोनों में ही मेयर का चुनाव होता है। दिल्ली में MCD है, तो मुंबई में BMC, लेकिन दोनों की पावर में काफी अंतर है।
दिल्ली और मुंबई के मेयर में क्या अंतर है?
MCD vs BMC Mayor Powers Difference: दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों की नगर पालिकाएं शहर की सफाई, सड़कें, पानी और स्वास्थ्य जैसी सेवाओं का ध्यान रखती हैं। लेकिन दिल्ली की म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन ऑफ दिल्ली (MCD) और मुंबई की बृहनमुंबई म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन (BMC) में कई अंतर हैं। खासकर उनके बजट, संरचना और मेयर की भूमिका में। दोनों मेयर की पावर सीमित हैं, लेकिन कुछ फर्क हैं, जो शहर की गवर्नेंस को प्रभावित करते हैं। आइए जानते हैं इनके बारे में।
बजट और आर्थिक ताकत में बड़ा अंतर
BMC इंडिया की सबसे अमीर नगर पालिका है, जिसका बजट 74,000 करोड़ रुपये से ज्यादा है। वहीं, MCD का बजट सिर्फ 16,530 करोड़ रुपये के आसपास है। यह फर्क BMC को बड़े प्रोजेक्ट्स जैसे सड़कें, अस्पताल और जल आपूर्ति में ज्यादा निवेश करने की क्षमता देता है। मुंबई की BMC पूरे महाराष्ट्र में सबसे बड़ी है और शहर की आबादी 1.2 करोड़ से ज्यादा होने के बावजूद, यह सेवाएं बेहतर तरीके से संभालती है।
दूसरी तरफ, दिल्ली की MCD को केंद्र और राज्य सरकारों से फंडिंग पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ता है, जिससे कभी-कभी देरी होती है। लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि बड़ा बजट मेयर को ज्यादा पावर नहीं देता, क्योंकि असली नियंत्रण कमिश्नर के पास होता है।
कार्यकाल दिल्ली में कम, मुंबई में ज्यादा
दोनों शहरों में मेयर का चुनाव कॉर्पोरेटर्स द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से होता है, यानी आम लोग सीधे वोट नहीं देते। दिल्ली में MCD के पास 250 कॉर्पोरेटर्स हैं, जबकि मुंबई की BMC में 227 हैं। लेकिन कार्यकाल में फर्क है। दिल्ली के मेयर का टर्म सिर्फ 1 साल का होता है, जिससे वे लंबे समय की योजनाएं नहीं बना पाते। मुंबई में मेयर 2.5 साल तक पद पर रहता है, जो उन्हें थोड़ा ज्यादा स्थिरता देता है। मुंबई में मेयर कॉर्पोरेशन की मीटिंग्स की अध्यक्षता करता है और शहर का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन दिल्ली में 2022 में MCD को फिर से एक किया गया था, पहले यह तीन भागों में बंटी थी, जिससे प्रशासनिक चुनौतियां बढ़ीं हैं।
मेयर की पावर
दिल्ली और मुंबई दोनों में मेयर की भूमिका मुख्य रूप से औपचारिक है, यानी वे शहर के पहले नागरिक के रूप में प्रतिनिधित्व करते हैं, लेकिन असली एक्जीक्यूटिव पावर म्यूनिसिपल कमिश्नर के पास होती है। कमिश्नर एक सीनियर IAS अधिकारी होता है, जिसे राज्य सरकार नियुक्त करती है। मुंबई में BMC एक्ट 1888 के तहत मेयर सिर्फ मीटिंग्स चलाता है और सुझाव दे सकता है, लेकिन फाइनेंशियल, प्रशासनिक और प्रोजेक्ट एक्जीक्यूशन का कंट्रोल कमिश्नर के पास है।
दिल्ली में भी यही सिस्टम है, जहां मेयर कॉर्पोरेशन मीटिंग्स की अध्यक्षता करता है, लेकिन एक साल के छोटे टर्म और स्टैंडिंग कमिटी की मंजूरी की जरूरत से उनकी पावर और सीमित हो जाती है। फर्क यह है कि दिल्ली में केंद्र सरकार का ज्यादा हस्तक्षेप होता है, क्योंकि MCD संसद के अधिनियम से चलती है, जबकि मुंबई में महाराष्ट्र सरकार का ज्यादा कंट्रोल है। विशेषज्ञों का कहना है कि मेयर को ज्यादा पावर देने से शहर की गवर्नेंस बेहतर हो सकती है, जैसे न्यूयॉर्क में जहां मेयर के पास एक्जीक्यूटिव अथॉरिटी है।