बस्तर पंडुम पर सियासत: लखेश्वर कश्यप ने उठाए सवाल, बोले- उत्सव के नाम पर संस्कृति का हो रहा बाजारीकरण बंद करे सरकार
इन्द्रावती नदी बचाओ समिति के जिलाध्यक्ष लखेश्वर कश्यप ने शासन द्वारा 'पंडूम उत्सव' के नाम पर किए जा रहे करोड़ों रुपये के खर्च पर सवाल उठाते हुए इसे बस्तर की आत्मा से छेड़छाड़ बताया है।
इन्द्रावती नदी बचाओ समिति के जिलाध्यक्ष लखेश्वर कश्यप
अनिल सामंत- जगदलपुर। इन्द्रावती नदी बचाओ समिति के जिलाध्यक्ष लखेश्वर कश्यप ने शासन द्वारा ‘पंडूम उत्सव’ के नाम पर किए जा रहे करोड़ों रुपये के खर्च पर तीखा सवाल उठाते हुए इसे बस्तर की आत्मा से छेड़छाड़ करार दिया है। लखेश्वर कश्यप ने कहा कि शासन को स्वयं यह स्पष्ट नहीं है कि वास्तविक पंडूम क्या है? फिर भी इसे एक औपचारिक, मंचीय और प्रचारात्मक आयोजन में बदलकर आदिवासी संस्कृति का विकृतिकरण किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि पंडूम बस्तर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर है। दक्षिण बस्तर में इसे पंडूम और मध्य बस्तर सहित अन्य क्षेत्रों में माटी तिहार के नाम से जाना जाता है। यह कोई एक- दो दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि प्रकृति, समाज और देव परंपरा से जुड़ा महीनों चलने वाला सामूहिक अनुष्ठान है, जिसकी शुरुआत चैत्र नवरात्रि से होती है। इसमें महुआ के फूल, आम, आवला और धान की पुटकी माटी देव को अर्पित की जाती है। लोग जंगल जाकर पारदी खेलते हैं और जो भी प्राप्त होता है, उसे माटी देव को चढ़ाकर प्रसाद के रूप में पूरे समाज में बांटा जाता है।
पंडूम बस्तर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर
श्री कश्यप ने कहा कि पंडूम बस्तर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर है। दक्षिण बस्तर में इसे पंडूम और मध्य बस्तर सहित अन्य क्षेत्रों में माटी तिहार के नाम से जाना जाता है। यह कोई एक-दो दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि प्रकृति,समाज और देव परंपरा से जुड़ा महीनों चलने वाला सामूहिक अनुष्ठान है, जिसकी शुरुआत चैत्र नवरात्रि से होती है। इसमें महुआ के फूल, आम, आवला और धान की पुटकी माटी देव को अर्पित की जाती है। लोग जंगल जाकर पारदी खेलते हैं और जो भी प्राप्त होता है, उसे माटी देव को चढ़ाकर प्रसाद के रूप में पूरे समाज में बांटा जाता है। दक्षिण बस्तर में इस दौरान महिलाएं बाट छेकनी की परंपरा निभाती हैं। जिसमें वे रास्ता रोककर आने-जाने वालों से पारंपरिक रस्म अदायगी कराती हैं। यह सब आदिवासी जीवन की सामूहिकता, समानता और सहभागिता का प्रतीक है।
सरकार परंपराओं को बिना समझे प्रचार तक कर रही सिमित
उन्होंने कहा कि शासन इन जीवंत परंपराओं को समझे बिना, केवल मंच, बैनर और प्रचार तक सीमित कर रहा है, जो हमारी सांस्कृतिक आत्मा के साथ अन्याय है। जब बस्तर के हर गांव में अलग-अलग समय पर पारंपरिक त्योहार होते हैं, तो उसी समय पर गांव या ब्लॉक स्तर पर वास्तविक सांस्कृतिक प्रोत्साहन क्यों नहीं दिया जाता? इससे लोग अपनी जड़ों से जुड़े रहेंगे और संस्कृति जीवित रहेगी। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि ‘पंडूम’ जैसे पारंपरिक नामों के साथ छेड़छाड़ करने के बजाय, यदि शासन को कोई बड़ा आयोजन करना ही है तो उसका नाम ‘ऐतिहासिक बस्तर संस्कृति महोत्सव’ रखा जाए, ताकि उसकी आत्मा सुरक्षित रहे।
यह है बस्तर पंडुम
पंडूम कोई सरकारी आयोजन नहीं, बल्कि बस्तर के आदिवासी समाज का प्रकृति-केंद्रित जीवन उत्सव है। इसकी शुरुआत चैत्र नवरात्रि से होती है और यह लगभग एक माह तक चलता है। इसमें जंगल,अन्न,फल,फूल,देव परंपरा और सामूहिकता का गहरा संबंध होता है। माटी देव को अर्पण,पारदी खेल,प्रसाद वितरण और बाट छेकनी जैसी परंपराएं केवल रस्में नहीं,बल्कि समाज को जोड़ने वाली सांस्कृतिक डोर हैं। इसे मंचीय तमाशे में बदलना, इसकी आत्मा को नष्ट करना है।