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IMF ने अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण वैश्विक महंगाई बढ़ने और आर्थिक विकास दर धीमी होने की चेतावनी दी है। तेल-गैस सप्लाई बाधित होने से 2026 का आर्थिक परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है।

इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) की मैनेजिंग डायरेक्टर क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने गहरी चिंता जताते हुए कहा है कि भले ही अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा युद्ध जल्दी खत्म हो जाए, लेकिन इसके बाद भी वैश्विक विकास की रफ्तार बेहद धीमी रहेगी।

उन्होंने संकेत दिया कि अब सभी रास्ते 'ऊंची कीमतों' और 'धीमी ग्रोथ' की ओर ही जाते हैं। IMF ने पहले अनुमान लगाया था कि 2026 में ग्लोबल ग्रोथ 3.3% रहेगी, लेकिन युद्ध की ताजा स्थिति ने इस पूर्वानुमान को पूरी तरह संशोधित करने पर मजबूर कर दिया है। 14 अप्रैल को जारी होने वाले 'वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक' में नए और कम आंकड़े पेश किए जाएंगे।

​ग्लोबल तेल और गैस सप्लाई में भारी कमी 
युद्ध का सबसे घातक असर ऊर्जा सेक्टर पर पड़ा है। आंकड़ों के अनुसार, ग्लोबल तेल सप्लाई में अब तक 13% की कमी आ चुकी है। इसका सबसे बड़ा कारण ईरान द्वारा 'स्टेट ऑफ होर्मुज' को प्रभावी ढंग से ब्लॉक करना है।

यह एक ऐसा संकरा रास्ता है जिससे दुनिया के लगभग 20% तेल और गैस का व्यापार होता है। इसके बंद होने से सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा गई है और वैश्विक बाजार में कीमतें आसमान छू रही हैं।

​ऊर्जा संकट से सभी सेक्टर प्रभावित 
क्रिस्टालिना जॉर्जीवा के अनुसार, यह संकट सिर्फ तेल तक सीमित नहीं है। युद्ध के कारण गैस, हीलियम, उर्वरक और अन्य संबंधित सप्लाई चेन तक इसका असर फैल गया है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर की 72 एनर्जी सुविधाओं को नुकसान पहुंचा है, जिनमें से एक-तिहाई को काफी गंभीर क्षति हुई है।

विशेष रूप से कतर में गैस उत्पादन सुविधाओं को पहुँचे नुकसान के कारण, वहां उत्पादन को युद्ध पूर्व स्तर (17% बहाली) पर लाने में 3 से 5 साल का समय लग सकता है।

​निर्यात करने वाले देशों पर भी दोहरी मारआमतौर पर माना जाता है कि युद्ध से सिर्फ आयात करने वाले देशों को नुकसान होता है, लेकिन जॉर्जीवा ने स्पष्ट किया कि ऊर्जा निर्यात करने वाले देश भी इससे अछूते नहीं हैं। ईरान और कतर जैसे देशों की बुनियादी सुविधाओं पर हुए हमलों ने उनकी निर्यात क्षमता को लंबे समय के लिए कम कर दिया है।

इसका सीधा मतलब है कि वैश्विक बाजार में लंबे समय तक ऊर्जा की कमी बनी रहेगी, जो अंततः हर सेक्टर में उत्पादन लागत को बढ़ाएगी।

​निष्कर्ष: 2026-27 की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती 
महामारी के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था रिकवरी की ओर थी, लेकिन इस युद्ध ने विकास के पहियों को जाम कर दिया है। जॉर्जीवा का मानना है कि यदि तनाव और बढ़ा, तो वैश्विक मंदी की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

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