पाकिस्तान में ऐतिहासिक हिंदू मंदिर तोड़ा गया: 1947 से बंद था पूजा-पाठ, बाबरी विध्वंस के बाद लोगों ने बनाया था निशाना

Historic Hindu Temple Demolished in Pakistan
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खैबर मंदिर 70 सालों से बंद था।
Hindu Temple Demolished in Pakistan: खैबर मंदिर पाकिस्तान में अफगानिस्तान सीमा पर खैबर जिले के शहर लंडी कोटाल बाजार में स्थित था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह धीरे-धीरे लुप्त होता जा रहा था।

Hindu Temple Demolished in Pakistan: पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा के पास खैबर जिले के सीमावर्ती शहर लंडी कोटल बाजार में यह मंदिर स्थित था। जब 1947 में देश का बंटवारा हुआ, तभी से यह मंदिर बंद था। मंदिर की देखरेख और पूजा पाठ करने वाला परिवार भारत आ गया था। इसके कारण इसकी हालत जीर्ण-शीर्ण हो गई थी।

मंदिर के तोड़े जाने पर कुछ लोगों ने आवाज उठाई। लेकिन उनकी आवाज बहुसंख्यक मुस्लिमों के बीच दब गई। प्रशासनिक विभागों के अधिकारियों ने या तो हिंदू मंदिर के अस्तित्व के बारे में जानकारी होने से इनकार किया या दावा किया कि निर्माण नियमों के अनुसार हो रहा है।

पत्रकार ने कहा- पूर्वजों से सुनी हैं मंदिर की कहानी
लंडी कोटल के प्रमुख आदिवासी पत्रकार इब्राहिम शिनवारी ने कहा कि बाजार में यह एक ऐतिहासिक मंदिर था। जिसे 1947 में बंद कर दिया गया था। वहां रहने वाले हिंदू देश के विभाजन के बाद परिवार समेत भारत चले आए। उनका दावा है कि 1992 में जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विध्वंस हुआ तो कुछ मौलवियों ने इसे आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया था। इब्राहिम ने अपने बचपन को याद करते हुए कहा कि उन्होंने अपने पूर्वजों से मंदिर के बारे में कई कहानियां सुनी हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि लंडी कोटल में यह मंदिर 'खैबर मंदिर' नाम से मशहूर था।

शिनवारी ने कहा कि ऐतिहासिक गैर-मुस्लिम पूजा स्थलों को बनाए रखना और संरक्षित करना औकाफ विभाग की जिम्मेदारी है, लेकिन खैबर आदिवासी जिले में विभाग का कोई कार्यालय या कर्मचारी नहीं है। कई वृद्ध आदिवासी बुजुर्ग इस तथ्य की गवाही देंगे कि मुख्य लंडी कोटल बाजार में एक मंदिर था।

Hindu Temple Demolished in Pakistan
मंदिर पर कॉम्पलेक्स का निर्माण जारी है।

मंदिर की सुरक्षा की जिम्मेदारी जिला प्रशासन की
पाकिस्तान हिंदू मंदिर प्रबंधन समिति के हारून सरबदियाल ने जोर देकर कहा कि गैर-मुसलमानों के लिए धार्मिक महत्व की ऐतिहासिक इमारतों की सुरक्षा और पुनर्वास सुनिश्चित करना जिला प्रशासन और संबंधित सरकारी विभागों की जिम्मेदारी है। पुरातत्व और संग्रहालय विभाग, पुलिस, संस्कृति विभाग और स्थानीय सरकार पूजा स्थलों सहित ऐसे स्थलों की रक्षा के लिए 2016 के पुरावशेष कानून से बंधे हैं।

रिकॉर्ड में मंदिर का कोई जिक्र नहीं
डॉन अखबार ने लंडी कोटल के सहायक आयुक्त मुहम्मद इरशाद के हवाले से कहा कि बताया कि उन्होंने मंदिर के विध्वंस के बारे में अनभिज्ञता व्यक्त की और कहा कि खैबर आदिवासी जिले के आधिकारिक भूमि रिकॉर्ड में मंदिर का कोई उल्लेख नहीं है। लंडी कोटल बाजार की पूरी जमीन राज्य के स्वामित्व में थी।

अधिकारी ने कहा कि लैंडी कोटल बाजार में कुछ पुरानी दुकानों के नवीनीकरण और मरम्मत के लिए बिल्डर को 'अनापत्ति प्रमाण पत्र' जारी किया गया था। तहसील नगरपालिका अधिकारियों ने आदिवासी जिलों में सभी वाणिज्यिक और व्यापार केंद्रों पर वाणिज्यिक भवनों या दुकानों की अनुमति दी है।

पटवारी बोला- मंदिर पर निर्माण की जानकारी नहीं
तहसील नगर अधिकारी (टीएमओ) शाहबाज खान ने कहा कि स्थानीय सरकार को क्षेत्र में सभी व्यवसायिक बिल्डिंग के निर्माण के लिए हरी झंडी देने के लिए अधिकृत किया गया था। उनका नक्शा भी पास हो गया है। शुल्क भी जमा कर दिया गया है। नगर निगम अधिकारी स्वीकार करते हैं कि उनके पास खैबर जिले में प्रामाणिक और व्यवस्थित राजस्व रिकॉर्ड नहीं हैं। लंडी कोटल के पटवारी जमाल अफरीदी ने दावा किया कि उन्हें मंदिर स्थल पर निर्माण गतिविधि की जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा कि राजस्व रिकॉर्ड में उस स्थान पर किसी मंदिर का कोई उल्लेख नहीं है।

उन्होंने कहा कि अगर सरकार धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति अपने दायित्वों को पूरा करने में विफल रहती है, तो उनके सभी पूजा स्थल और अन्य ऐतिहासिक इमारतें जल्द ही गायब हो जाएंगी। शिनवारी ने खैबर में जिला प्रशासन और नगर निगम अधिकारियों के मंदिर का कोई आधिकारिक भूमि रिकॉर्ड नहीं होने के दावों पर सवाल उठाया।

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