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बसपा सरकार में कद्दावर मंत्री रहे सिद्दीकी के आने से सपा को बुंदेलखंड और मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर बड़ा सियासी फायदा मिल सकता है।

लखनऊ : उत्तर प्रदेश के कद्दावर मुस्लिम नेताओं में शुमार और बहुजन समाज पार्टी के पूर्व 'चाणक्य' रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी अब समाजवादी पार्टी में शामिल होने जा रहे हैं। कांग्रेस से इस्तीफा देने के ठीक 20 दिन बाद उन्होंने अखिलेश यादव के साथ जाने का मन बना लिया है।

नसीमुद्दीन सिद्दीकी का सपा में जाना न केवल पार्टी के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड में मजबूती लाएगा, बल्कि इससे आगामी चुनावों के लिए जातीय और धार्मिक समीकरण भी बदल सकते हैं।

​कांग्रेस से विदाई और 'फिरकापरस्ती' पर प्रहार

​नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने करीब 20 दिन पहले कांग्रेस पार्टी को अलविदा कह दिया था। इस्तीफा देते समय उन्होंने स्पष्ट किया था कि उनका मुख्य उद्देश्य 'फिरकापरस्त ताकतों' को हराना है।

उनका मानना है कि वर्तमान राजनीतिक माहौल में समाजवादी पार्टी ही वह मंच है जो इन शक्तियों के खिलाफ मजबूती से लड़ सकती है। सिद्दीकी का कांग्रेस छोड़ना पार्टी के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि वे यूपी में पार्टी के प्रमुख मुस्लिम चेहरों में से एक थे।

​बसपा के 'पिलर' से सपा के 'सारथी' तक का सफर

​नसीमुद्दीन सिद्दीकी कभी मायावती के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार माने जाते थे। बसपा सरकार में उनके पास एक साथ कई महत्वपूर्ण विभाग हुआ करते थे। हालांकि, 2017 के चुनाव के बाद उन्हें बसपा से निष्कासित कर दिया गया था।

इसके बाद उन्होंने अपनी पार्टी बनाई और अंततः कांग्रेस में शामिल हो गए। अब समाजवादी पार्टी में उनकी एंट्री को अखिलेश यादव की उस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके तहत वे पुराने और अनुभवी नेताओं को जोड़कर पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को और मजबूत करना चाहते हैं।

​बुंदेलखंड और मुस्लिम वोटों पर असर

​नसीमुद्दीन सिद्दीकी मूल रूप से बांदा के रहने वाले हैं। बुंदेलखंड के साथ-साथ पश्चिमी यूपी के मुस्लिम मतदाताओं के बीच उनकी पकड़ काफी मजबूत मानी जाती है।

सपा में उनके शामिल होने से पार्टी को मुस्लिम-दलित गठजोड़ बनाने में मदद मिल सकती है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अखिलेश यादव उन्हें संगठन में कोई बड़ी जिम्मेदारी दे सकते हैं या आगामी चुनावों में उनके प्रभाव का इस्तेमाल बड़े स्तर पर किया जाएगा।

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