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सीएम योगी आदित्यनाथ ने थारू जाति के लिए 7,000 परिवारों को भू-स्वामित्व देकर उनके जीवन का अंधकार मिटा दिया है। यह कदम समुदायों का 'पुनर्निर्माण' है जिनकी तीन-पीढ़ियां अपनी ही माटी पर हक के लिए तरस गई थीं।

उत्तर प्रदेश के तराई अंचल में दशकों से उपेक्षा और प्रशासनिक मार झेल रहे थारू जनजाति और विस्थापित परिवारों के लिए बीते 11अप्रैल 2026 की तारीख स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हो गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखीमपुर खीरी के चंदनचौकी और मोहम्मदी में आयोजित भव्य कार्यक्रमों के जरिए करीब 4,356 परिवारों को भूमि के मालिकाना हक आवंटित किए।

यह केवल एक प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि उन समुदायों के 'पुनर्निर्माण' की शुरुआत थी, जिनकी तीन-तीन पीढ़ियां अपनी ही माटी पर मालिकाना हक के लिए तरस गई थीं। 

मुख्यमंत्री ने स्पष्ट संदेश दिया कि अब विकास केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अधिकारहीन लोगों को सम्मान के साथ मुख्यधारा में स्थापित किया जाएगा।

दशकों पुरानी उपेक्षा और अस्तित्व का संघर्षथारू जनजाति के लिए पिछली सरकारों का दौर किसी काले अध्याय से कम नहीं था। वर्षों तक यह समाज वनाधिकारों और प्रशासनिक उदासीनता की भेंट चढ़ा रहा। अपनी ही भूमि पर इनके पास कोई कानूनी दस्तावेज नहीं था, जिसके कारण इन्हें 'अतिक्रमणकारी' की नजर से देखा जाता था। इस उपेक्षा ने न केवल उनकी आर्थिक स्थिति को बदहाल किया, बल्कि उन्हें सामाजिक रूप से भी हाशिए पर धकेल दिया था।

जहां पिछली सरकारों ने इन्हें सिर्फ वोट बैंक समझा, वहीं वर्तमान सरकार ने इनके अस्तित्व को पहचान देकर एक सुरक्षित भविष्य की नींव रखी है।

महाराणा प्रताप के वंशज: थारू समाज का गौरवशाली इतिहास और अटूट स्वाभिमान 
​थारू जनजाति का इतिहास केवल तराई के जंगलों तक सीमित नहीं है, बल्कि इनके सम्बन्ध राजस्थान के चित्तौड़गढ़ और महाराणा प्रताप के गौरवशाली सिसौदिया राजपूत वंश से भी हैं। 

ऐतिहासिक मान्यताओं और लोक कथाओं के अनुसार, मुगलों के आक्रमण के समय मेवाड़ के योद्धाओं और उनके परिवारों ने अपनी संस्कृति और धर्म की रक्षा के लिए हिमालय की तराई के इन घने जंगलों में शरण ली थी।

थारू समाज आज भी स्वयं को उन्हीं वीर राजपूतों का वंशज मानता है, जिन्होंने विषम परिस्थितियों में भी मुगलों के सामने झुकना स्वीकार नहीं किया।

​थारू समाज की महिलाओं का विशिष्ट पहनावा, उनके आभूषण और उनकी सामाजिक व्यवस्था आज भी राजस्थानी राजपूत संस्कृति की झलक पेश करती है।

पूर्व की सपा सरकार के समय दर्ज मुकदमों की वापसी 
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने थारू समाज को सबसे बड़ी राहत उनके ऊपर लदे मुकदमों के बोझ को हटाकर दी है। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि सपा के कार्यकाल के दौरान थारू समुदाय के लोगों को डराने और प्रताड़ित करने के लिए जो मुकदमे दर्ज किए गए थे, उन्हें अब वापस लिया जाएगा।

ये मुकदमे अक्सर वन विभाग और राजस्व विवादों के नाम पर छोटी-छोटी बातों पर दर्ज कर उन्हें कचहरी के चक्कर काटने पर मजबूर करने के लिए उपयोग किए जाते थे। इन मुकदमों की वापसी थारू समाज के लिए एक नए और स्वतंत्र जीवन की शुरुआत है।

4,356 थारू परिवारों को मिला भू-स्वामित्वचंदनचौकी में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने थारू जनजाति के 4,356 परिवारों को उनकी भूमि के अधिकार पत्र और 'घरौनी' सौंपी। दशकों तक ये लोग जिस जमीन पर खेती करते थे, उस पर इनका कोई अधिकार नहीं था। पिछली सरकारों की सुस्ती के कारण ये परिवार हमेशा बेदखली के साये में जीते थे। अब मालिकाना हक मिलने से ये परिवार अपनी जमीन के असली मालिक बन गए हैं।

यह पट्टा उनके लिए केवल कागज नहीं, बल्कि उनकी आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षा की गारंटी है।

विस्थापितों को मिला सम्मान और 'रवींद्र नगर' की पहचान 
सिर्फ थारू ही नहीं, बल्कि बांग्लादेश से विस्थापित होकर दशकों से शरणार्थी का जीवन जी रहे 331 हिंदू परिवारों को भी भू-स्वामित्व दिया गया। पिछली सरकारों ने इन विस्थापितों की पीड़ा को नजरअंदाज किया और उन्हें उनकी पहचान से भी वंचित रखा।

उनकी बस्ती, जिसे पूर्व में 'मियांपुर' कहा जाता था, उसका नाम बदलकर अब 'रवींद्र नगर' कर दिया गया है। यह पहचान की पुनर्स्थापना है, जो दिखाती है कि वर्तमान सरकार इतिहास की गलतियों को सुधारकर समाज के हर वर्ग को सम्मान देने के लिए प्रतिबद्ध है।

पक्के आवास और सुरक्षित पुनर्वास का उपहारउपेक्षा से पुनर्निर्माण की इस यात्रा में आवास एक महत्वपूर्ण कड़ी है। मुख्यमंत्री ने उन हजारों परिवारों को पक्के आवास की सुविधा सुनिश्चित की है, जो पिछली सरकारों की अनदेखी के कारण फूस की झोपड़ियों में रहने को मजबूर थे। भू-स्वामित्व मिलने के बाद अब ये परिवार प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री आवास योजनाओं के सीधे पात्र हो गए हैं। अब थारू समाज के बच्चों को सिर पर पक्की छत और सुरक्षित वातावरण मिलेगा, जो उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए अनिवार्य है।

1234 करोड़ की परियोजनाओं से बदलती तस्वीर 
लखीमपुर खीरी के तराई क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाएं पहुँचाना पिछली सरकारों की प्राथमिकता में कभी नहीं रहा। योगी सरकार ने पलिया, श्रीनगर, निघासन, गोला और मोहम्मदी क्षेत्रों के लिए ₹1234 करोड़ से अधिक की कुल 527 विकास परियोजनाओं की सौगात दी है। इन परियोजनाओं के माध्यम से सड़कें, बिजली और बाढ़ नियंत्रण के पुख्ता इंतजाम किए जा रहे हैं। जहां पहले ये इलाके मानसून में दुनिया से कट जाते थे, वहां अब विकास की नई राहें तैयार हो रही हैं।

आर्थिक सशक्तिकरण और स्वयं सहायता समूहों को बढ़ावा 
पिछली सरकारों ने थारू समाज की पारंपरिक कला को कभी बाजार से जोड़ने का प्रयास नहीं किया। वर्तमान सरकार ने थारू महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए 300 से अधिक स्वयं सहायता समूहों (SHG) को ₹30,000 से लेकर ₹1.5 लाख तक की वित्तीय सहायता प्रदान की है। इस मदद से थारू समाज की महिलाएं अपने हस्तशिल्प और मूंज के उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुंचा सकेंगी। यह आर्थिक आजादी उन्हें बिचौलियों के शोषण से बचाएगी और परिवार को नई ताकत देगी।

अंत्योदय का संकल्प और अन्य राज्यों के लिए मिसाल 
योगी सरकार का यह कदम साबित करता है कि जहां चाह होती है, वहां राह निकल आती है। थारू जनजाति से लेकर बांग्लादेशी शरणार्थियों तक, जिस तरह सरकार ने संवेदनशीलता दिखाते हुए उन्हें अधिकार और पहचान दी है, वह 'सबका साथ-सबका विकास' के मंत्र को धरातल पर उतारता है। पिछली सरकारों के अत्याचारों का अंत कर यह सरकार एक ऐसे समाज का निर्माण कर रही है जहां हर व्यक्ति को अपनी माटी पर गर्व हो। यह मॉडल अब पूरे देश के लिए एक प्रेरणा बन चुका है।

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