आगरा : उत्तर प्रदेश के आगरा जिले से एक ऐसी भावुक तस्वीर सामने आई है जिसने सोशल मीडिया से लेकर गलियों तक हर किसी की आंखें नम कर दी हैं। आमतौर पर लोग पालतू जानवरों के जाने पर दुख जताते हैं, लेकिन आगरा के शाहदरा बगीची क्षेत्र में रहने वाले घनश्याम दीक्षित के परिवार ने अपने पालतू लेब्राडोर 'टाइगर' के निधन पर वह सब कुछ किया जो एक सगे पारिवारिक सदस्य की मृत्यु पर किया जाता है।
परिवार ने न केवल टाइगर की अंतिम यात्रा निकाली, बल्कि हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार उसका मुंडन और तेरहवीं संस्कार भी संपन्न किया।
14 साल का साथ और 'तिलकधारी' की पहचान
घनश्याम दीक्षित इस बेजुबान साथी को करीब 14 साल पहले दिल्ली से अपने घर लाए थे। उन्होंने इसका नाम 'टाइगर' रखा था, लेकिन अपनी मासूमियत और वफादारी के कारण वह पूरे मोहल्ले का लाडला बन गया था। परिवार के सदस्य बताते हैं कि टाइगर को रोजाना नियम से तिलक लगाया जाता था, जिसके कारण आसपास के लोग उसे प्यार से 'तिलकधारी' कहकर बुलाने लगे थे।
इन 14 वर्षों में टाइगर ने कभी किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया और वह घर के बच्चों के साथ बड़े बेटे की तरह घुल-मिल गया था। दीक्षित परिवार के लिए वह महज एक कुत्ता नहीं, बल्कि घर का एक ऐसा सदस्य था जिसकी मौजूदगी के बिना पूरा घर अधूरा लगता था।
अंतिम यात्रा में गमगीन हुआ पूरा इलाका
बीते 28 जनवरी को लंबी बीमारी के बाद टाइगर ने दम तोड़ दिया। टाइगर के जाने की खबर जैसे ही मोहल्ले में फैली, बड़ी संख्या में लोग दीक्षित परिवार के घर पहुँच गए। परिवार का दुख इतना गहरा था कि घनश्याम दीक्षित के बड़े बेटे ने अपने प्रिय साथी के बिछड़ने के गम में दो दिनों तक अन्न का दाना तक नहीं छुआ।
टाइगर की अंतिम विदाई को यादगार बनाने के लिए उसकी शव शय्या को फूलों से सजाया गया और पूरे सम्मान के साथ उसकी अंतिम यात्रा निकाली गई। इसके बाद बुलंदशहर के पवित्र राजघाट पर पूरे विधि-विधान के साथ उसका अंतिम संस्कार किया गया।
हिंदू रीति-रिवाजों का पालन और मुंडन संस्कार
टाइगर के निधन के बाद परिवार ने शोक की सभी मर्यादाओं का पालन किया। जिस प्रकार घर के किसी बुजुर्ग या सदस्य के जाने पर शोक मनाया जाता है, दीक्षित परिवार ने वैसा ही किया। टाइगर की आत्मा की शांति के लिए रविवार को तेरहवीं का विशेष आयोजन किया गया। इस मौके पर परिवार के सदस्यों ने अपना मुंडन कराया, जो हिंदू धर्म में अपार शोक और सम्मान प्रकट करने का एक तरीका है। घर के आंगन में हवन-पूजन का आयोजन किया गया ताकि उसकी आत्मा को शांति मिल सके।
13 ब्राह्मणों को भोज और दान-दक्षिणा
तेरहवीं के संस्कार को पूर्ण करने के लिए परिवार ने 13 ब्राह्मणों को आमंत्रित किया था। टाइगर की तस्वीर के सामने दीप प्रज्वलित कर उसे श्रद्धांजलि दी गई और फिर विधि-विधान से ब्रह्मभोज कराया गया।
ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद उन्हें दान-दक्षिणा देकर विदा किया गया। परिवार का मानना है कि टाइगर ने 14 साल तक जिस निष्ठा से उनके घर की रखवाली की और खुशियां बिखेरीं, यह आयोजन उसी ऋण को उतारने का एक छोटा सा प्रयास है।
इंसान और बेजुबान के रिश्ते की नई मिसाल
आगरा की यह घटना आज के दौर में उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो बेजुबान जानवरों के साथ क्रूरता करते हैं। दीक्षित परिवार ने साबित कर दिया कि प्रेम और वफादारी की कोई भाषा नहीं होती। टाइगर की वफादारी, उसकी मासूमियत और घर के प्रति उसका अपनापन आज भी परिवार की यादों में जिंदा है।











