Logo
प्रदेश में राम जन्मोत्सव के अवसर पर लगभग 15 हजार स्थानों पर सामाजिक समरसता कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। विश्व हिंदू परिषद के इस अभियान में जनजाति समाज की भागीदारी बढ़ाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

भोपाल। मध्यप्रदेश में जनजाति समाज को अपने साथ जोड़ने की राजनीतिक और सामाजिक कोशिशें तेज हो गई हैं। विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने राम जन्मोत्सव के अवसर पर बड़े पैमाने पर सामाजिक समरसता कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बनाई है। प्रदेश के लगभग 15 हजार स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिनमें विशेष रूप से आदिवासी समाज की भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाएगा। आयोजनों में रामायण से जुड़े उन प्रसंगों को विशेष रूप से सामने रखा जाएगा जिनका संबंध वनवासी और जनजातीय पात्रों से है।

19 मार्च से शुरू होंगे कार्यक्रम, दो हफ्ते चलेंगे
विहिप द्वारा आयोजित यह अभियान 19 मार्च से शुरू होकर करीब दो सप्ताह तक चलेगा। इस दौरान प्रदेश के महाकौशल, मालवा और मध्यभारत क्षेत्र में राम जन्मोत्सव के कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इन आयोजनों में भगवान राम के जीवन से जुड़े ऐसे प्रसंगों को प्रमुखता दी जाएगी जिनमें वनवासियों और सामान्य लोगों की भूमिका का उल्लेख मिलता है। उदाहरण के तौर पर शबरी माता, निषादराज और केवट की कथाओं का जिक्र कार्यक्रमों में किया जाएगा ताकि आदिवासी समाज के साथ सांस्कृतिक जुड़ाव को रेखांकित किया जा सके।

राजनीतिक रूप से अहम है जनजाति समाज
मध्यप्रदेश की राजनीति में जनजाति समुदाय को बेहद प्रभावशाली माना जाता है। राज्य की लगभग 22 फीसदी आबादी आदिवासी वर्ग से आती है, इसलिए चुनावी गणित में इस समाज की भूमिका अहम मानी जाती है। प्रदेश की 47 विधानसभा सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं, जबकि लगभग 80 से अधिक सीटें ऐसी हैं जहां आदिवासी मतदाता चुनाव के नतीजे तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यदि जनजाति समाज का झुकाव किसी एक दल की ओर हो जाए तो सरकार बनाने का रास्ता काफी आसान हो जाता है।  

जनजाति क्षेत्रों पर दिया जाएगा विशेष ध्यान
कार्यक्रमों के लिए विशेष रूप से जनजाति बहुल इलाकों और आदिवासी बस्तियों को प्राथमिकता दी जा रही है। आयोजनों में स्थानीय समुदाय के लोगों को आमंत्रित किया जाएगा और उन्हें मंच पर भी स्थान दिया जाएगा। इन कार्यक्रमों में भगवान राम के जीवन से जुड़े प्रसंगों का वर्णन किया जाएगा, खासकर उन कथाओं का जिनमें वनवासी पात्रों की भक्ति और योगदान का उल्लेख मिलता है। आयोजकों का मानना है कि इससे समाज के विभिन्न वर्गों के बीच सांस्कृतिक एकता का संदेश जाएगा।  

7