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बीना विधायक निर्मला सप्रे केस में हाईकोर्ट सख्त, कहा- बिना पुख्ता सबूत सदस्यता खत्म नहीं। 20 अप्रैल को अगली सुनवाई, सिंघार को सबूत पेश करने के निर्देश।

जबलपुर। सागर जिले की बीना विधानसभा सीट से विधायक निर्मला सप्रे से जुड़े दल-बदल विवाद पर हाईकोर्ट में मंगलवार को सुनवाई हुई। इस दौरान सप्रे ने अदालत के सामने कहा कि वह अभी भी कांग्रेस की सदस्य हैं। हाई कोर्ट ने उनके इस बयान को रिकॉर्ड पर लेते हुए नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार को निर्देश दिया कि वे अपने आरोपों के समर्थन में ठोस साक्ष्य पेश करें। इस मामले में अगली सुनवाई 20 अप्रैल को होनी है, जबकि कांग्रेस नेता उमंग सिंघार को 9 अप्रैल तक पार्टी व्हिप की प्रतियां हाईकोर्ट में पेश करने को कहा गया है। इसी दिन विधानसभा स्पीकर के सामने अहम सुनवाई भी होगी।

भाजपा में शामिल होने के आरोप
मामला तब शुरू हुआ जब आरोप लगे कि निर्मला सप्रे ने 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा ज्वाइन कर ली थी। बताया गया कि उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीता, लेकिन बाद में राजनीतिक निष्ठा बदल ली। इसी आधार पर याचिका लगाकर उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त करने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता पक्ष का तर्क है कि संविधान की 10वीं अनुसूची (एंटी-डिफेक्शन कानून) के अनुसार दल-बदल की स्थिति में विधायक की सदस्यता खत्म हो सकती है।

सोशल मीडिया सबूतों पर कोर्ट सख्त
जब स्पीकर स्तर पर निर्णय लंबित रहा, तब इस मामले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। उमंग सिंघार का कहना है कि सप्रे के भाजपा से जुड़े होने के पर्याप्त संकेत मौजूद हैं। सुनवाई के दौरान विपक्ष की ओर से सोशल मीडिया पोस्ट, फोटो और सार्वजनिक कार्यक्रमों में मौजूदगी को सबूत के रूप में पेश करने की बात कही गई। हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल सोशल मीडिया सामग्री को निर्णायक साक्ष्य नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए प्रमाणिक दस्तावेज जरूरी हैं।

स्पीकर के समक्ष भी सुनवाई जारी
राज्य की ओर से महाधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि विधानसभा स्पीकर के सामने भी यह मामला विचाराधीन है और संबंधित पक्षों के बयान दर्ज किए जा चुके हैं। सप्रे ने वहां भी खुद को कांग्रेस का सदस्य बताया है। ऐसे में अंतिम निर्णय स्पीकर की प्रक्रिया और पेश किए जाने वाले सबूतों पर निर्भर करेगा। अब इस मामले की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि याचिकाकर्ता किस तरह के साक्ष्य पेश करते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल आरोपों के आधार पर सदस्यता खत्म नहीं की जा सकती।

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