भोपाल। मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक माहौल काफी गरमाया गया है। तीन राज्यसभा सांसदों का कार्यकाल 9 अप्रैल को समाप्त हो रहा है, ऐसे में नई सीटों पर चुनाव होना है। इस बीच कांग्रेस और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने चुनाव में हॉर्स ट्रेडिंग यानी विधायकों की खरीद-फरोख्त की आशंका जताई है, जिससे राजनीतिक विवाद और गहरा गया है। उमंग सिंघार का कहना है कि भाजपा पहले भी कई राज्यों में सरकारें गिराने और विधायकों को तोड़ने का काम कर चुकी है, इसलिए मध्य प्रदेश में भी ऐसा होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
हार के बहाने खोज रहे सिंघार
उमंग सिंघार ने कहा हार्स ट्रेडिंग की आशंका है, कांग्रेस इस स्थिति से अवगत है और पूरी मजबूती के साथ चुनाव की तैयारी कर रही है। सिंघार ने कहा हमें पूरा विश्वास है कि कांग्रेस के सभी विधायक पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करेंगे। वहीं, भाजपा की ओर से मंत्री राकेश सिंह ने इस बयान पर पलटवार किया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को अपनी हार साफ दिखाई दे रही है, इसलिए वह पहले से ही बहाने ढूंढ रही है। उनके अनुसार, हॉर्स ट्रेडिंग जैसे आरोप सिर्फ हार को सही ठहराने के लिए लगाए जा रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि तीसरी सीट पर उम्मीदवार उतारने का फैसला पार्टी स्तर पर लिया जाएगा और इस पर अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी।
सीट जीतने के लिए चाहिए 65 विधायक
अगर राज्यसभा चुनाव के गणित को समझें, तो एक सीट जीतने के लिए 58 विधायकों का समर्थन जरूरी होता है। कांग्रेस के पास कुल 65 विधायक हैं, जो सामान्य स्थिति में एक सीट जीतने के लिए पर्याप्त हैं। लेकिन कुछ परिस्थितियों के कारण कांग्रेस की स्थिति कमजोर होती नजर आ रही है। बीना से विधायक निर्मला सप्रे पहले ही भाजपा के समर्थन में नजर आ चुकी हैं। इसके अलावा विजयपुर के विधायक मुकेश मल्होत्रा किसी भी मतदान में भाग नहीं ले सकते। वहीं दतिया के विधायक राजेंद्र भारती को कोर्ट द्वारा सजा सुनाई गई है, जिससे उनकी स्थिति भी अनिश्चित हो गई है।
बिगड़ सकता है कांग्रेस की जीत का गणित
इन कारणों से कांग्रेस के पास प्रभावी रूप से कम विधायक बचते हैं, जिससे राज्यसभा सीट जीतने का गणित बिगड़ सकता है। यही वजह है कि पार्टी के भीतर चिंता का माहौल है और विपक्ष इसे लेकर लगातार सवाल उठा रहा है। सिंघार ने इस पूरे मुद्दे को लोकतंत्र के लिए भी खतरा बताया है। उनका कहना है कि देश धीरे-धीरे ऑटोक्रेसी यानी चुनावी सत्तावाद की ओर बढ़ रहा है, जहां लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव डाला जाता है और निष्पक्ष चुनाव की प्रक्रिया प्रभावित होती है। कुल मिलाकर, मध्य प्रदेश का यह राज्यसभा चुनाव सिर्फ एक राजनीतिक प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि यह सत्ता संतुलन, विधायकों की निष्ठा और लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा बन चुका है।










