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राज्य सरकार ने 1 अप्रैल 2026 से इस प्रणाली पर आधिकारिक रोक लगा दी है इसके साथ ही मार्केट कमेटी को भी सख्त हिदायत दी गई है।

हरियाणा की अनाज मंडियों में दशकों से चली आ रही 'कच्ची पर्ची' की व्यवस्था पर अब पूर्ण विराम लग गया है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के कड़े रुख के बाद, राज्य सरकार ने 1 अप्रैल 2026 से इस प्रणाली पर आधिकारिक रोक लगा दी है। अब आढ़तियों के लिए किसानों को फसल खरीद के बाद अनिवार्य रूप से डिजिटल 'जे-फॉर्म' देना होगा।

हाईकोर्ट के हस्तक्षेप से बदली व्यवस्था
यह पूरी कार्रवाई भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के पूर्व मुख्य वैज्ञानिक डॉ. वीरेंद्र सिंह लाठर द्वारा दायर एक जनहित याचिका के बाद हुई है।हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार को निर्देश दिया था कि 30 दिनों के भीतर इस शिकायत पर ठोस कदम उठाए जाएं। समय सीमा समाप्त होने पर, बुधवार को सरकार ने सभी मार्केट कमेटियों के सचिवों को सख्त निर्देश जारी कर दिए हैं कि मंडियों में किसी भी सूरत में कच्ची पर्ची नहीं चलेगी।

'कच्ची पर्ची' से कैसे होता था किसानों का नुकसान?
याचिकाकर्ता डॉ. लाठर के अनुसार, कच्ची पर्ची व्यवस्था बिचौलियों और साहूकारों के लिए शोषण का हथियार बनी हुई थी:
MSP का फर्जीवाड़ा: आढ़ती सरकारी कागजों में फसल को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदा दिखाते थे, लेकिन किसानों को 'कच्ची पर्ची' थमाकर कम दाम दिए जाते थे।
पारदर्शिता का अभाव: इन पर्चियों पर न तो दुकान का नाम होता था और न ही कोई कानूनी वैधता, जिससे गड़बड़ी होने पर किसान कहीं शिकायत नहीं कर पाता था।
कर्ज का जाल: सही दाम न मिलने और हिसाब में हेरफेर के कारण हरियाणा और पंजाब के किसान मेहनत के बावजूद कर्ज के दलदल में फंसे रहते थे।

नई व्यवस्था से क्या बदलेगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलाव से कृषि क्षेत्र में बड़ी क्रांति आएगी। डॉ. लाठर का दावा है कि कच्ची पर्ची बंद होने से किसानों की सालाना कमाई 30-40 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। 3 हेक्टेयर जमीन वाले किसान की आय 7 लाख रुपये से अधिक हो सकती है।अब प्रिंटेड रसीद या जे-फॉर्म पर दुकान का नाम, पता, तारीख और सही वजन दर्ज होगा।याचिका में किसानों के लिए एक समर्पित हेल्पलाइन नंबर शुरू करने की भी मांग की गई है ताकि किसी भी गड़बड़ी पर तुरंत रिपोर्ट की जा सके।

मार्केट कमेटी को सख्त हिदायत
सरकार ने साफ कर दिया है कि यदि कोई आढ़ती अब भी कच्ची पर्ची जारी करता पाया गया, तो उसका लाइसेंस रद्द किया जा सकता है। अधिकारियों को आदेश दिया गया है कि वे मंडियों में औचक निरीक्षण करें और सुनिश्चित करें कि हर किसान को उसकी फसल का उचित दाम और पक्का जे-फॉर्म मिले।

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