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छत्तीसगढ़ में सरकारी प्रयासों से अब रागी की फसल के प्रति किसान आकर्षित होने लगे हैं। इससे धान की अपेक्षा दोगुना लाभ मिल रहा है।

श्यामकिशोर शर्मा- राजिम। राजिम विधानसभा क्षेत्र के ग्राम पतोरा के किसान रोमनाथ साहू को धान की अपेक्षा रागी से दोगुना मुनाफा मिला है। रागी को कम समय में ज्यादा मुनाफा देने वाली फसल माना जाता है। इसमें प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है। साथ ही अमीनो एसिड, कैल्शियम और पोटेशियम भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। कम हीमोग्लोबिन वाले व्यक्तियों के लिए रागी का सेवन बेहद फायदेमंद है। 

हजारों साल पुराना है रागी का इतिहास
खेती-किसानी में मुनाफे वाली फसलों को बढ़ावा देने के लिए राज्य शासन एवं केंद्र शासन द्वारा लगातार प्रोत्साहित किया जा रहा है। इन्हीं में से लघुधान्य फसल रागी एक ऐसी फसल है, जिसका हजारों साल पुराना इतिहास है।

माना जाता है कि, इसकी खेती भारत में लगभग 4 हजार साल पहले शुरू हुई थी, जबकि इसकी बुवाई सबसे पहले अफ्रीका में की गई थी। हमारे पूर्वज इसकी खेती करते थे, लेकिन बीच में कृषकों का रुझान धान और गेहूं की फसलों की ओर बढ़ गया, जिससे लघु धान्य फसल रागी खेतों और भोजन की थाली से लगभग गायब हो गई। 

सरकारी प्रयास रंग लाने लगे
परंतु अब शासन के लगातार प्रचार-प्रसार के कारण कृषकों ने अपने खेतों में रागी को पुन: स्थान देना शुरू कर दिया है। कृषक रोमनाथ साहू ने बताया कि इस वर्ष उन्होंने 8 एकड़ में रागी फसल की खेती की है।

सामान्यत: रागी की खेती भर्री-टिकरा या उच्च भूमि में की जाती है, लेकिन इन्होने धान वाले खेत में इसकी खेती कर एक नया प्रयोग किया है। उनकी रागी फसल की बढ़वार काफी अच्छी है। वर्तमान में बालियां निकल रही हैं, जिससे अच्छी उपज के आसार स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं।

रागी में कीट प्रकोप बहुत कम 
रागी की खेती काफी सरल है। इसमें कीट एवं रोगों का प्रकोप बहुत कम होता है, जिसके कारण इसकी खेती में लागत भी कम आती है। उन्होंने अपनी फसल का पंजीयन बीज उत्पादन कार्यक्रम के तहत बीज निगम, जिला गरियाबंद में कराया है, जहां प्राप्त उत्पादन की खरीदी की जाएगी।

इस वर्ष कृषकों को रागी की बीज किस्म वी.एल. मंडुआ-376 राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत उपलब्ध कराई गई है। यह किस्म अगेती पैदावार के लिए विकसित की गई है और बीज रोपाई के 95 से 100 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। 

प्रति हेक्टेयर 25 से 30 क्विंटल तक उत्पादन
इसके पौधे मध्यम ऊंचाई के होते हैं और दाने हल्के भूरे रंग के होते हैं। इस किस्म का उत्पादन प्रति हेक्टेयर 25 से 30 क्विंटल तक पाया जाता है। रागी की फसल ग्रीष्मकालीन धान की एक बेहतर वैकल्पिक फसल के रूप में उभर रही है, जो किसानों को धान की अपेक्षा अधिक आमदनी देने में सक्षम है।

बीज के साथ कीटनाशक भी दे रहा विभाग
के.आर. वर्मा, वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी ने बताया कि, कृषकों को रागी का बीज एवं आदान सामग्री के रूप में सुपर कम्पोस्ट, निंदानाशक और जैविक कीटनाशक कार्यालय से प्रदाय किए गए हैं। साथ ही समय-समय पर कृषि विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों द्वारा समसामयिक सलाह और तकनीकी मार्गदर्शन भी दिया जा रहा है। 

शुष्क जलवायु रागी के लिए उपयुक्त 
उप संचालक कृषि, जिला गरियाबंद ने बताया कि रागी की खेती के लिए शुष्क जलवायु उपयुक्त होती है। भारत में इसे मुख्यत: खरीफ फसल के रूप में उगाया जाता है। इसके पौधों को अधिक वर्षा की आवश्यकता नहीं होती। यह फसल किसानों के लिए अधिक लाभकारी मानी जाती है।

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